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मीडिया शोध की सीमाएं

मीडिया पर इधर जो शोध प्रबंध प्रकाशित हुए हैं, उनमें कुछ अपवादों को छोड़कर गंभीर अध्ययन और प्रौढ़ विवेचन का सर्वथा अभाव है। अधिकतर शोध प्रबंधों में मीडिया-अनुसंधान की कई दिशाएं अटूती रह गई हैं। मीडिया शोधार्थी से जिस अनुशीलन और परिश्रम की अपेक्षा की जाती है, उसकी बेतरह कमी दिखाई पड़ती है। कहने की जरूरत नहीं कि प्राध्यापक बनने की अर्हता अर्जित करने के लिए यानी सिर्फ अकादमिक डिग्रियां लेने के लिए हो रहे ये शोध रस्म अदायगी भर हैं। इन अधिकतर शोध प्रबंधों में संबद्ध विषय को लेकर न कोई दृष्टि है न विषय पर नया प्रकाश पड़ता है न कोई नया रास्ता खुलता दिखता है। शोधार्थी के खास मत-अभिमत का भी पता नहीं चलता।

हिंदी में मीडिया पर गंभीर शोध की प्रवृत्ति नहीं होने से पूर्व में प्रकाशित पुस्तकों, संदर्भ ग्रंथों अथवा शोध प्रबंधों में दिए गए गलत तथ्य भी अविकल उद्धृत किए जाते रहे हैं और उन तथ्यों की सत्यता जांचने की जहमत प्राय: नहीं उठाई जाती और ऐसा बहुत पहले से होता चला आ रहा है।

हिंदी के प्रिंट मीडिया पर पहला शोध छह दशक से भी पहले राम रतन भटनागर ने किया था। ‘राइज एंड ग्रोथ आव हिंदी जर्नलिज्म’ नामक शीर्षक से अंग्रेजी में लिखे-छपे उनके प्रबंध पर प्रयाग विश्वविद्यालय से उन्हें डाक्टरेट की उपाधि मिली थी। डॉ भटनागर ने 1826 से 1945 तक की हिंदी के प्रिंट मीडिया को अपने शोध का विषय बनाया था।

उनका शोध प्रबंध 1947 में प्रकाशित हुआ। उस प्रंबध की सीमा यह थी कि उसमें गलत तथ्यों की भरमार थी। उसमें पुराने पत्रों के प्रकाशन काल तक की गलत सूचनाएं थीं। उदाहरण के लिए ‘उचित वक्ता’ का प्रकाशन 7 अगस्त 1880 को शुरू हुआ था, पर भटनागर जी ने उसका प्रकाशन 1878 बताया था। इसी भांति ‘भारत मित्र ’ का प्रकाशन 17 मई 1878 को शुरू हुआ था जबकि भटनागर जी ने उसे 1877 बताया था।

विडंबना यह है कि भटनागर जी के शोध प्रबंध की उक्त गलत सूचनाओं को उनके परवर्ती काल के शोधार्थी दो दशकों तक उद्धृत करते रहे। वह सिलसिला 1968 में डॉ कृष्ण बिहारी मिश्र का शोध प्रबंध छपने के बाद ही थमा। डॉ. मिश्र ने ‘हिंदी पत्रकारिता : जातीय चेतना और खड़ी बोली की निर्माण-भूमि’ शीर्षक नामक अपने शोध प्रबंध में भटनागर के प्रबंध में दर्ज गलत सूचनाओं को सप्रमाण काटा।

उसके बाद, देर से ही सही, डॉ़ भटनागर के शोध प्रबंध की कमियों को दूर करते हुए उसका संशोधित संस्करण 2003 में विश्वविद्यालय प्रकाशन, वाराणसी से छापा गया। वैसे अप्रामाणिक तथ्यों के लिए सिर्फ भटनागर जी को दोष देना उचित नहीं है। यह गलती दूसरे नामी अध्येताओं से भी हुई है। हिंदी पत्रकारिता का पहला इतिहास (शोध प्रबंध नहीं) राधाकृष्ण दास ने लिखा था। ‘हिंदी भाषा के सामयिक पत्रों का इतिहास’ शीर्षक उनकी पुस्तक 1894 में नागरी प्रचारिणी सभा से छपी थी। पर उसमें भी कई गलत सूचनाएं थीं।

बाबू राधाकृष्ण दास ने उस किताब में ‘बनारस अखबार’ को हिंदी का पहला पत्र बताया था। इसी किताब को आधार मानते हुए बाल मुकुंद गुप्त ने भी ‘बनारस अखबार’ को ही हिंदी का पहला अखबार लिख डाला। दूसरी तरफ, प्रो़ कल्याणमल लोढ़ा और शिवनारायण खन्ना ने ‘दिग्दर्शन’ को हिंदी का पहला पत्र बताया किंतु ब्रजेंद्रनाथ बनर्जी ने इस तथ्य को सप्रमाण प्रस्तुत किया कि 30 मई 1826 को प्रकाशित ‘उदंत मार्तंड’ हिंदी का पहला पत्र है। अचरज की बात है कि तथ्य संबंधी गलती आचार्य रामचंद्र शुक्ल से भी हुई। उन्होंने अपने हिंदी साहित्य के इतिहास में ‘उचित वक्ता’ का प्रकाशन 1878 बता डाला है। दरअसल राधाकृष्ण दास की किताब को आधार बनाने से यह चूक शुक्ल जी से हुई।

तथ्यों की प्रामाणिकता की दृष्टि से डॉ कृष्णबिहारी मिश्र का शोध प्रबंध एक मानक है और विशिष्ट उपलब्धि भी। उन्होंने साबित किया कि शोध एक श्रमसाध्य और गंभीर विधा कर्म है, लेकिन त्रासद स्थिति है कि इधर के कई मीडिया शोधार्थियों ने मिश्र के शोध प्रबंध की सामग्री हड़प लेने में कोई संकोच नहीं किया है। एक शोधार्थी ने तो मिश्र जी के प्रबंध की पूरी सामग्री ली ही, उस लेखिका ने आभार का पन्ना भी जस का तस अपने नाम से छपवा लिया है। अभी-अभी मीडिया संबंधी एक अन्य शोध प्रबंध को हूबहू किसी दूसरे शोधार्थी द्वारा अपने नाम से प्रस्तुत करने का मामला प्रकाश में आया है। यह मामला इसलिए पकड़ में आया क्योंकि नकल किया गया प्रबंध जांचने के लिए उसी विशेषज्ञ के पास गया, जिसने पहले प्रबंध को जांचा था। फिलहाल सबसे बड़ी जरूरत शोधार्थियों में शोध-वृत्ति जागृत करना और उन्हें शोध के महत्व का बोध कराना है।

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