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कहां गये बाघ, पसोपेश में सरकार

कहां गये बाघ? सरकार पसोपेश में है। वर्ष 2008 की जनगणना के मुताबिक सूबे के एकमात्र ‘टाइगर प्रोजेक्ट’ घोषित वाल्मीकि राष्ट्रीय उद्यान में कुल 7 बाघ देख गये हैं। वैसे वहां अधिकतम 11 बाघ होने की सूचना है। पर वन विभाग केआंकड़े को माने तो वर्ष 2002 में इस राज्य में 54 बाघ थे।

वाल्मीकि राष्ट्रीय उद्यान में 33, मुंगेर-बांका  के जंगल में 11 और कैमूर की आश्रयणी में 6 बाघ देखे गये थे। 2003 में बाघों की संख्या 52 पर पहुंच गई। वर्ष 2005 में ही राज्य सरकार ने अपनी गणना में सूबे में 35 बाघों के दिखने की बात कही थी। तब मुख्य वन प्राणी प्रतिपालक बीए खान ने कहा था कि ‘टाइगर प्रोजेक्ट’ घोषित वाल्मीकि राष्ट्रीय उद्यान में 35 बाघ दिखे हैं। पर अचानक बाघों की संख्या अब 7 पर पहुंच गई है। वह भी सिर्फ वाल्मीकि राष्ट्रीय उद्यान में।

कैमूर और मुंगेर में तो पिछले कई साल से बाघ नहीं दिख रहे। हालांकि वर्ष 2000 में बांका-मुंगेर जंगल के क्षेत्र अमरपुर में एक बाघ मरा पाया गया था। 2001 में शंभुगंज में एक और मरा मिला तो राजौन में वर्ष 2002 में एक बाघ के मरने की खबर सामने आयी थी।

विभागीय अधिकारियों का कहना है बाघ कम दिखने के कई कारण हैं। पिछली गणनाओं में सही ढंग से गिनती नहीं होती थी और बाघों के पंजो को देख कर अनुमान के आधार पर संख्या घोषित कर दी जाती थी। भारतीय वन्य प्राणी संस्थान, देहरादून की देखरेख में इस बार कड़ाई से बाघों की गणना हुई।

दूसरा कारण यह है कि वाल्मीकि राष्ट्रीय उद्यान के बाघ के विचरण वाले इलाके ‘मदनपुर’ और ‘सोमेश्वर’ ब्लॉक में कैमरा ही नहीं लगा जिससे असली तस्वीर सामने नहीं आयी। तीसरा यह है कि वाल्मीकि राष्ट्रीय उद्यान से सटे उत्तर प्रदेश के वन्य प्राणी उद्यान एवं नेपाल के चितवन राष्ट्रीय उद्यान में बाघों के माईग्रेशन से भी इंकार नहीं किया जा सकता है। सीएफ (वन्य प्राणी) संतोष तिवारी ने कहा कि इन स्थितियों के कारण ही फिर से बाघों की गिनती कराने पर विचार किया जा रहा है।

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