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इस साल के चर्चित परिवारों से

इस साल के चर्चित परिवारों से

विरोधी शांत, वोटर मुरीद, और अब क्या चाहिए

भारतीय राजनीति के प्रथम परिवार यानी, गांधी परिवार के लिए साल 2009 कामयाबी भरा रहा। यूपीए प्रथम के दौरान सोनिया गांधी के कामकाज पर लोगों की निगाहें थीं और कहा जा रहा था कि कांगेस अध्यक्ष की असली परीक्षा आम चुनाव में होगी। 2009 के आम चुनाव में सोनिया और राहुल की अगुवाई में कांगेस ने बेहतरीन प्रदर्शन किया और सीटों की संख्या दो के पार ले जाने में कामयाब रहे। इस दौरान राहुल को लेकर तमाम तरह की बातें कही गयीं, जैसे कि वह सुविधा पसंद हैं, लोकप्रियता का दिखावा करते हैं, दिखावे के लिए गांव और गरीबों के पास जाते हैं, चुनाव के बाद वही प्रधानमंत्री बनेंगे वगैरह,, वगैरह। लेकिन तमाम बातों को झुठलाते हुए राहुल ने मंत्री पद लेने से भी इनकार कर दिया और कहा कि वह संगठन पर ध्यान देना चाहते हैं। इस दौरान सोनिया गांधी और राहुल का तालेमल देखने लायक रहा। संगठन पर इन दोनों का प्रभाव न केवल बना रहा बल्कि उसे और मजबूती मिली।

सोनिया गांधी के पास कोई संवैधानिक पद नहीं है, इसके बावजूद वह पार्टी और सरकार का केंद्र बनी रहीं। नाजुक मौकों पर वह प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का संबल भी बनीं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि आम तौर पर पांच साल के शासन के बाद किसी भी पार्टी के शीर्ष नेता की लोकप्रियता में गिरावट देखी जाती है पर सोनिया इसका न केवल अपवाद रहीं बल्कि उनकी लोकप्रियता में इजाफा भी हुआ। शायद यही वजह है कि हाल के दिनों में जितने भी चुनाव हुए हैं, उनमें कांग्रेस ने सफलता हासिल की है। साल के अंत में हुए झारखंड विधानसभा चुनाव में भी पार्टी अपने पिछले रिकॉर्ड को सुधारने में कामयाब रही, जबकि राजनीतिक विश्लेषक कांग्रेस को बहुत ज्यादा भाव नहीं दे रहे थे।

राहुल गांधी का ग्रामीण इलाकों का दौरा भी काफी सफल रहा। हालांकि दलितों के घर रात गुजारने के उनके कार्यक्रमों की काफी आलोचना की गयी पर आम लोगों में इसका सकारात्मक संदेश गया। खासकर गरीबों में जो पारंपरिक रूप से कांग्रेस से जुड़े रहे थे। अब ब्रिटेन के युवराज प्रिंस विलियम्स और डेविड मिलिबैंड ने भी कुछ ऐसा ही किया है। यानी राहुल के इस कदम को विदेशों में भी मान्यता मिली। अपने देश में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी ऐसा किया। जाहिर है खुद को और पार्टी को आम लोगों से जोड़ने का यह सबसे कारगर तरीका साबित हुआ। पब्लिक अफेयर विशेषज्ञ राजेश दीक्षित के मुताबिक राहुल की सामाजिक सद्भाव की राजनीति का यह बेहतरीन नमूना है और इससे पार्टी को अपना खोया जनाधार पाने में मदद मिली। युवा कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में राहुल के प्रतिभा खोज अभियान के कारण देश भर के युवा कांग्रेस की ओर आकर्षित हुए और आम चुनाव में पार्टी को इसका फायदा मिला। इस बारे में ज्यादातर युवाओं की राय रही कि कम से कम उनमें एक नयापन झलकता है। युवक कांग्रेस के सांगठनिक चुनाव में पारदर्शिता लाने के लिए एक जानी-मानी संस्था की सेवा लेकर राहुल ने यह संदेश देने का काम किया कि सही लोग ही आगे आ पाएंगे। हाल के वर्षो में युवाओं में राजनीति को लेकर उकताहट सी दिखायी देती थी पर राहुल ने उस सोच को बदलने का काम किया है।

राहुल गांधी इससे इंकार करते हैं पर बहुत सारे लोग उन्हें आम चुनाव में कांग्रेस को मिली सफलता का भी श्रेय देते हैं। खासकर उत्तर प्रदेश में पार्टी को जितनी सीटें मिलीं वह किसी ने सोचा भी नहीं था। जो भी हो इससे शायद ही कोई इनकार करेगा कि राहुल पार्टी में एक नया जोश भरने में कामयाब रहे। इसीलिए नवनियुक्त भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी ने भी राहुल की तारीफ की। कुल मिलाकर देखें तो कांग्रेस की एक नयी इमेज बनी है। जाने-माने कवि व पत्रकार मंगलेश डबराल मानते हैं कि राहुल के प्रधानमंत्री बनने का रास्ता साफ हुआ है और आज पार्टी में कोई ऐसा कद्दावर नेता नहीं है जो उनकी दावेदारी को चुनौती दे सके।

राहुल की शादी को लेकर कई बार सवाल उठाए जाते हैं पर उन्होंने साफ कर दिया है कि फिलहाल उनका सारा ध्यान मिशन उत्तर प्रदेश यानी कि 2012 के विधान सभा चुनाव पर है। जाहिर है राहुल ने अपना इरादा जता दिया है और आलोचनाओं से डरे बिना वे उस पर बढ़ रहे हैं। लोग एक संकोची युवा का कद्दावर नेता बनना देख रहे हैं।

सोनिया गांधी के पास कोई संवैधानिक पद नहीं है, इसके बावजूद वह पार्टी और सरकार का केंद्र बनी रहीं। यही वजह है कि हाल के दिनों में जितने भी चुनाव हुए हैं, उनमें कांग्रेस ने सफलता हासिल की है। साल के अंत में हुए झारखंड विधानसभा चुनाव में भी पार्टी अपने पिछले रिकॉर्ड को सुधारने में कामयाब रहीसियासी घराना! यानी जिस पूरे परिवार में सियासत बहती है। उसके अलम्बरदार हैं मुलायम सिंह यादव..और युवा खेवनहार की भूमिका में हैं अखिलेश यादव! गुजरते साल में इस परिवार ने यूपी की सियासत में डिंपल यादव के रूप में नया चेहरा उतारा। वह फिरोजाबाद संसदीय सीट से प्रत्याशी रहीं। इसमें उन्हें पराजय मिली लेकिन उनकी हार से परिवार का हौसला नहीं हारा। अलबत्ता इससे सबक लिया गया और जनसंघर्ष की एक नई स्क्रिप्ट न सिर्फ तैयार की गई बल्कि उस पर आगे काम भी हुआ। परिवार का यह राजनीतिक ‘मूव’ भी यूपी की सियासत की सुर्खियाँ बना।

समाजवादी चिन्तक डॉ.राममनोहर लोहिया के विचारों से प्रभावित होकर सैफई के युवा मुलायम सिंह यादव ने सपा की बुनियाद डाली और उसे वटवृक्ष बनाया। इसमें भाई प्रो.राम गोपाल यादव, शिवपाल यादव, बेटे अखिलेश यादव ने सहयोगी की भूमिका निभाई। दूसरे रिश्तेदार भी इसी परिवार की डोर थामकर सियासत की ऊँची सीढ़ियों तक गए। वर्ष 2009 में फिरोजाबाद संसदीय सीट के उपचुनाव में इस घराने ने सियासत को नया चेहरा दिया..यानी अखिलेश यादव की पत्नी डिम्पल यादव को चुनावी मैदान में उतारा। परिवार को जीत का पूरा यकीन था। क्योंकि यह सीट अखिलेश यादव के इस्तीफे से खाली हुई थी। मगर, डिम्पल यादव चुनाव हार गईं। इस सियासी घराने ने इसको एक सबक के रूप में लिया। तभी तो सपा के प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश यादव भी कहते हैं, ‘मेरी पत्नी की हार में मेरे रिश्तेदारों की अहम भूमिका है, अच्छे वर्कर मेरी प्राथमिकता हैं। अब इन रिश्तेदारों को वर्कर्स (कार्यकर्ताओं) की राह में खड़े नहीं होने दूँगा।’ यानी परिवार अब सियासत की बेल को आगे फलने-फूलने देने के लिए संघर्ष का रास्ता अख्तियार करेगा। क्योंकि इसी रास्ते पर चलकर ही पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव ने सूबे की राजनीति को न सिर्फ नई दिशा दी बल्कि दल को सत्तारूढ़ भी किया था।

इससे इतर अगर इस परिवार की राजनीतिक पृष्ठभूमि की ओर जाएं तो परिवार के मुखिया मुलायम सिंह यादव ने ‘माई’ यानी मुसलमान-यादव गठजोड़ को आगे रखकर समाजवादी पार्टी खड़ी की थी। गुजरते साल में यह गठजोड़  छीजता नजर आया। पहले महासचिव अमर सिंह और दूसरे महासचिव आजम खाँ (अब सपा से निष्कासित) के बीच के द्वंद्व ने इसे झंझाेड़ा फिर कल्याण सिंह से रिश्ते ने बुनियाद को खोखला कर डाला। नतीजे में लोकसभा चुनाव में पार्टी उम्मीदों की मंजिल नहीं पा सकी।

डिम्पल यादव की फिरोजाबाद में हार ने इस परिवार को फिर से  मुश्किल दौर में धकेला जहां मुलायम सिंह यादव इसे कई बार बाहर खींचकर ला चुके हैं। दरअसल, लोकसभा चुनाव की डुगडुगी बजने से थोड़ा पहले ही समाजवादी पार्टी का मुसलमानों की नजर में बाबरी विध्वंस के जिम्मेदार कल्याण सिंह से सीधा जुड़ाव हुआ। इसी दौर में लोकसभा टिकट को लेकर पार्टी के दो महासचिवों यानी अमर सिंह व आजम खाँ के बीच तकरार तीखी हुई। आजम खाँ ने इस लड़ाई में कल्याण सिंह के नाम का इस्तेमाल ‘घातक बाणों’ के रूप में किया। इन बाणों ने सपा के ‘माई’ कांबिनेशन को हिला दिया। अलबत्ता सिने अभिनेत्री से राजनीतिज्ञ बनीं जया प्रदा फिर रामपुर से सांसद चुन ली गईं। आजम खाँ भी सपा से बाहर हो गए।
फीचर डेस्क, लखनऊ

बहू की हार से वर्कर याद आए
प्रदीप सौरभ

इंदिरा गांधी परिवार की बहुओं में सोनिया गांधी और मेनका गांधी के परिवारों का जिक्र किया जाये, तो विदेशी मूल का होने के बावजूद सोनिया ने जिस तरह कांग्रेस की विरासत और अपने बेटे राहुल गांधी के लिये जमीन तैयार की, वैसा करने में मेनका अब तक पूरी तरह विफल रही हैं। मेनका बतौर राजनेता अपने को स्थापित करने में तो असफल रही हीं, अपने बेटे वरुण गांधी को भी नेहरू परिवार की राजनीतिक विरासत की शालीनता देने में नाकामयाब रहीं। 2009 का साल मां मेनका और बेटे वरुण दोनों के लिये ही खास नहीं रहा। लेकिन इस परिवार की चर्चा टीआरपी की भाषा में कहें तो मीडिया में सबसे ज्यादा हुई। मेनका आवला लोकसभा सीट से चुनाव हारते-हारते बच गईं। वहीं वरुण गांधी को भड़काऊ भाषण देने के लिये जेल भी जाना पड़ा। उनके मुसलमानों के खिलाफ दिये गये भाषण से देश में तूफान खड़ा हो गया। उत्तेजनापूर्ण भाषण के बाद भी वरुण पीलीभीत से जीत कर लोकसभा की चौखट तक जरूर पहुंच गये। भाषण के बाद जो भाजपा उनके भाषण को उत्तर प्रदेश में ध्रवीकरण के तौर पर इस्तेमाल करने में जुटी थी, वही चुनाव में हार की वजहों में उसे एक मानने लगी। वरुण के अंदर संभावना थी और भाजपा उन्हें राहुल गांधी के सामने खड़ा कर सकती थी। लेकिन पार्टी की अंदरूनी राजनीति के वे शिकार हुए और संघ प्रमुख और पार्टी अध्यक्ष की शाबाशी के बावजूद पार्टी में वे अपनी जगह बनाने में नाकाम रहे। भाजपा युवा मोर्चा के एक सम्मेलन में वरुण ने पार्टी की वरिष्ठ नेता सुषमा स्वराज से पार्टी के युवाओं की कमान उन्हें सौंपने का आग्रह भी किया, लेकिन उसे खारिज कर दिया गया।

एक ने बेची आग, दूसरे ने पर्यावरण
पीलीभीत चुनाव के बाद वरुण का जो भाजपाकरण हुआ, उसने राजनीति में उनके लिये सारे रास्ते बंद कर दिये। अब वह भाजपा के पिंजड़े में कैद हैं। भड़काऊ भाषण के बाद कांग्रेस में उनके जाने के भी अब उनके लिये सारे रास्ते बंद हो गये हैं। प्रियंका गांधी के माध्यम से वरुण को कांग्रेस में लाने की कोशिशें हुईं थीं और राहुल के बाद नम्बर दो की स्थिति देने का प्रस्ताव था। लेकिन भाजपाई वरुण के लिए कांग्रेस और दूसरी पार्टियों के रास्ते भी बंद हो गये हैं। अब इस परिवार की स्थिति देश की सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी भाजपा में एक द्वीप जैसी हो गई है। यही नहीं मेनका ने जो राजनीति के बाहर एक सोशल एक्टिविस्ट का रुतबा बनाया था, वह भी उनकी राजनीति की भेंट चढ़ गया। सोशल सेक्टर में भी इस साल वे अहम भूमिका में नहीं रहीं।

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