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दो टूक (26 दिसंबर, 2009)

सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था की हालत किसी से छिपी नहीं है। राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के बारे में हाल की रिपोर्ट से जाहिर है कि किस तरह सरकारी धन का दुरुपयोग किया जा रहा है। सरकारी क्षेत्र के ज्यादातर अस्पताल बीमार हैं।

दूसरी ओर, रोगियों की सेवा की शपथ लेने वाले डॉक्टर ग्रामीण इलाकों में जाना पसंद नहीं करते। वे बेहतर वेतन और सुविधाओं की फिराक में निजी क्षेत्र में जा रहे हैं। लेकिन कुछ डॉक्टरों ने अपने नोबल प्रोफेशन की गरिमा बनाए रखी है। वे ऐशो-आराम की जिंदगी और पैसे को नहीं बल्कि लोगों की सेवा को तरजीह देते हैं। एम्स में पढ़कर छत्तीसगढ़ के ग्रामीणों का इलाज कर रहे डॉक्टरों के जज्बे को सलाम करना चाहिए।

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  • Web Title:दो टूक (26 दिसंबर, 2009)