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मृण्मय से चिन्मय

उस दिन शमशान में किसीकी आवाज सुनाई दी। ‘मिट्टी का शरीर था, मिट्टी में मिल गया।’ चिता जल रही थी। और वह बुजुर्ग सज्जन कह रहे थे। मैं सोचता रहा कि यह शरीर तो मिट्टी का बना होता है। लेकिन हम कुछ खास मौकों को छोड़कर कहां मान पाते हैं कि वह महज मिट्टी का होता है। कोई चीज है, जो मनुष्य को हमेशा शरीर से ऊपर सोचने को मजबूर करती रही है।
 
मिट्टी के शरीर को मृण्मय कहा जाता है। यह शरीर सचमुच मृण्मय होता है। लेकिन वह मृण्मय रहना नहीं चाहता। वह चिन्मय होना चाहता है। चिन्मय होने का मतलब है आत्मिक होना। यानी आत्मा के लिहाज से जीना। या जिसके लिए शरीर नहीं आत्मा परम हो। जब आत्मा परम होती है, तभी तो परमात्मा मिलता है। परम आत्मा के मायने हैं विशुद्ध। तमाम तरह की बुराइयों से दूर और अक्षत। शुद्ध ज्ञानमय। शुद्ध स्वरूप।
 
हम जिंदगी भर शरीर के इर्द-गिर्द ही चक्कर लगाते रहते हैं। शरीर से ऊपर उठ नहीं पाते। शरीर से ऊपर उठने की कामना ही हमें आत्मिक बनाती है। अपनी आत्मा की ओर ले जाती है। यानी अपने भीतर गहरे ले जाती है। अंतर्आत्मा की आवाज को शायद इसीलिए इतना महत्व दिया जाता है।
 
चिन्मय का मतलब चैतन्य होने से भी है। हम सोए नहीं रहें। हम जागें। हम खुद को संकुचित दायरों में कैद न करें। उस व्यापक से जुड़ाव महसूस करें। हम खुद को उस ब्रह्मांड का हिस्सा मानें। हमारे पिंड की लय जब ब्रह्मांड से मिल जाए, तो क्या बात है !

हमारे ऋषि कामना कर रहे थे, ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय। मृत्योर्मा अमृतगमय।’ हमें अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो। हमें मृत्यु से अमरता की ओर ले चलो। यह अमरता की चाहत ही हमें मृण्मय से चिन्मय की ओर ले जाती है। हम अमर तत्व से जुड़ाव चाहते हैं। यह शरीर तो नाशवान है। तब अमर क्या है? अमर है आत्मा। वह अविनाशी है। मनुष्य एक ऐसे तत्व की तलाश में रहा है, जिससे वह अमर हो सके। कोई तत्व है हमारे भीतर जो मरणशील नहीं है। हमें उसीकी साधना करनी पड़ती है।

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