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त्रिशंकु की राजसभा

आकाश में यक्ष, असुर, गंधर्व, किन्नर, गोया मनुष्यों को छोड़कर सब इकट्ठा हैं। राजा त्रिशंकु की सभा सजी हुई है। दृश्य रमणीक है। राजा त्रिशंकु शून्य में लटके हैं। वे अकेले नहीं हैं। उनकी सभा के सारे सभासद उनकी टांगें पकड़कर वहां पर भी झूल रहे हैं। मजबूरी है। हवा में लटकना है। किसी ने उनकी कमर पकड़ी है, किसी ने कलाई। कोई उंगली धरे है, कोई पहुंचा। जिनके हाथ कहीं नहीं पहुंचे वे एक हाथ से त्रिशंकु की नाक पकड़ने के प्रयास में हैं, और दूसरा हाथ राजा के कान तक पहुंचाने की फिराक में हैं।

धर-पकड़ का सीन है। अंतरिक्ष में चैनलों के सैटेलाइट कैमरे इस लोक लुभावन विहंगम दृश्य के सजीव प्रसारण की खातिर चमगादड़ हुए जा रहे हैं, जिससे उलटा लटककर वे सीधी तस्वीरें धरती तक भेज सकें। राजा त्रिशंकु की जान सांसत में है। वे लटके-लटके कोसते हैं उस महूरत को, जब उनके मन में सदेह स्वर्ग जाने की लालसा अंखुआई थी। उनके दिमाग में यह आयडिया यूं ही नहीं पनपा था।

उन्होंने अपने राज्य के एक पहुंचे हुए महात्मा के श्रीमुख से, जो भारत भूमि के एक आदर्श बंदीगृह में जेब-कर्तन के परिणामस्वरूप जीवन के पांच आनंददायी वर्ष व्यतीत कर त्रिशंकु की राजधानी में अपनी धर्म-ध्वजा फहराने आए थे, यह कथा सुन रखी थी कि वहां की सरकारी बसों और रेलगाड़ियों में चलने वाले प्राणों का त्याग किए बिना ही स्वर्ग-सुख पा लिया करते हैं। वहां के लोगों को बिना फुंके ही सरग नसीब हो जाया करता है। इसके लिए बस एक सरल योग-क्रिया करनी होती है, यात्रियों को बसों और ट्रेनों में उलटा लटकना होता है।

राजा त्रिशंकु ने भी सोचा, अगर इस पिद्दी भर के शीर्षासन से जन्नत मुहैया होती है, तो क्यों न वे भी उलटा लटक लें। उनकी कामना आज उनके ही गले की हड्डी बन चुकी है। वे लटक गए हैं, और उनके गले की हड्डी के पीछे उनके दरबारी कुत्तों की मानिंद खौं-खौं मचाए पड़े हैं। अचानक बगल से एक विमान हवा में कुछेक कागज की नोटें गिराता हुआ निकलता है। त्रिशंकु के दरबारी अपने ही राजा का हाथ छोड़ देते हैं। वे नोट बटोरने के फेर में आपस में भरत-मिलाप करने लगते हैं। त्रिशंकु का हवाई सिंहासन डगमगा उठता है। दरबारी हवा में उड़ रहे हैं। वे नीचे गिरने लगते हैं। सहसा उनको लगता है, वे आसमान से गिरकर एक खजूर के पेड़ पर अटक गए हैं। यह पेड़ झारखंड विधानसभा के प्रांगण में है।

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