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संवेदनशून्य राजनीति

रुचिका गिरहोत्रा के मामले ने हमारी व्यवस्था की संवेदनशून्यता उजागर कर दी है। उस घटना पर लोकतंत्र के रखवालों की टालमटोल ने बता दिया है कि हमारी राजनीति में न तो पारिवारिक मूल्यों के लिए संवेदनशीलता बची है न ही स्त्री व मानवाधिकारों के लिए। इसलिए रुचिका के पिता सुभाष गिरहोत्रा अगर इस व्यवस्था में गहरा अविश्वास जता रहे हैं तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। अस्सी के दशक की फिल्म ‘सारांश’ में महेश भट्ट ने व्यवस्था के अन्याय से लड़ते एक रिटायर शिक्षक के लिए जो उम्मीदें बचा कर रखी थीं यहां वे महज फिल्मी लग रही हैं। वहां पर राजनेता के गुंडों से एक लड़की को बचाने में वह शिक्षक इसलिए कामयाब हो जाता है क्योंकि मुख्यमंत्री उसका शिष्य निकलता है।

लेकिन हरियाणा जैसे संपन्न और विकसित राज्य में 19 सालों तक एक के बाद एक मुख्यमंत्री उस पुलिस अधिकारी को बचाने में लगा रहता है जिसने एक नाबालिग लड़की से न सिर्फ छेड़खानी की बल्कि उसे आत्महत्या करने को मजबूर किया और उसके भाई व परिवार का जीवन तबाह कर दिया। न्याय के सबसे ऊंचे दरवाजे से भी निराश होने के बाद रुचिका के पिता का फट पड़ना व्यवस्था के अन्याय से पीड़ित तमाम लोगों के स्वर देने जैसा था। 

उनकी लड़ाई न तो पहले निजी थी और अब इतना जाहिर होने के बाद तो कतई नहीं रह गई है। वह सार्वजनिक हित के लिए लड़ी जाने वाली एक प्रतिनिधि लड़ाई है। भले उन्होंने पूर्व मुख्यमंत्री ओम प्रकाश चौटाला पर पूर्व डीजीपी एसआरएस राठौर को साफ तौर पर बचाने का आरोप लगाया है लेकिन उन्होंने भजनलाल और भूपिंदर सिंह हुड्डा सहित किसी मुख्यमंत्री को इस मामले में पाक साफ नहीं बताया है। गिरहोत्रा के आरोप महज आरोप नहीं हैं। इस मामले की जांच करने वाले और राठौर पर मुकदमा दर्ज करने का सुझाव देने वाले पूर्व डीजीपी आरआर सिंह भी उनकी एक -एक बात की पु्ष्टि करते हैं। अगर वे न भी करते तो भी पिछले 19 साल की घटनाएं खुद ही इस अन्याय का बयान करने के लिए काफी हैं।

हमारी व्यवस्था पुलिस सुधारों की बड़ी बातें करती है। उसमें यह सुझाव भी है कि अगर पुलिस प्रशासन को निष्पक्ष तरीके से काम करने देना है तो उसे राजनीतिक दबावों से मुक्त रखना चाहिए। लेकिन जब राजनेता और पुलिस की साठगांठ के साथ किसी पर अत्याचार हो तो क्या किया जाए? जाहिर है अब वह समय आ गया है कि पुलिस प्रशासन को जनता के प्रति जवाबदेह बनाए जाना जरूरी है।

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