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मंदी से उबार गया 2009

वर्ष 2009 फाइनेंस के दौर से एक यादगार वर्ष रहा है। इस साल मंदी का खौफ मंडराता रहा, लेकिन जाते-जाते नौकरियों में फिर से रौनक लौटने के आसार दिखाई देने लगे हैं। सोने में भरपूर चमक लौट आई है तो रियल एस्टेट बाजार पटरी पर लौटता दिख रहा है। वहीं टेलीकॉम बाजार में इस साल कंपनियों के बीच घमासान शुरू होती दिखाई दी। कुल मिलाकर वर्ष 2009 भविष्य में आर्थिक जगत के लिए कई नसीहतें छोड़ गया।

सोना कितना सोणा है
पिछले साल की अमेरिकी सब प्राइम जनित आर्थिक मंदी ने शेयर बाजार और रियल एस्टेट बाजार की चूलें हिला कर रख दीं। ऐसे में सोना भला कहां चूकता, संकट की महक पाकर लगा कुलाचें भरने। पिछली दिवाली पर जहां शुद्ध सोना 12,000 प्रति दस ग्राम था, वह इस दिवाली पर 16,080 रुपये प्रति दस ग्राम हो गया।

सदियों से कहा जाता रहा है कि सोना बुरे वक्त में काम आता है, लेकिन इस बार की मंदी ने दिखा दिया है कि सोना सिर्फ संकट में ही काम नहीं आता, बल्कि निवेश का भी एक बेहतरीन विकल्प बन सकता है। ई-गोल्ड यानी गोल्ड ईटीएफ ने निवेशकों को नई राह दिखा दी है। यही नहीं, शुद्धता की कमी का खतरा भी अब बैंकों के सिक्कों ने दूर कर दिया। निवेशक बेफिक्र होकर निवेश करने लगे। यह हाल पूरी दुनिया में देखा जा रहा है।

पिछले एक साल में यह बात खासतौर पर देखी गई कि अर्थव्यस्था में मंदी के बाद लौटी तेजी का नकारात्मक असर सोने पर नहीं पड़ा, और तो और आईएमएफ जैसे बड़े खिलाड़ियों द्वारा सोना बेचे जाने की खबर भी सोने की चमक फीकी नहीं कर पाई।
 
कर्मचारियों के कंधे पर चढ़ा टैक्स भार         
संसद में पारित फाइनेंस (नं. 2) बिल, 2009 द्वारा समाप्त किए गए फ्रिंज बेनेफिट टैक्स से संबद्ध प्रावधानों के बाद विशेष रूप से वेतन आय पर टैक्स के मामले में पूरी तरह से परिदृश्य बदल चुका है। यह सत्य है कि वित्तीय वर्ष 2009-10 से फ्रिंज बेनेफिट टैक्स के प्रावधान पूरी तरह से समाप्त हो चुके हैं। एफबीटी के दौर में ज्यादातर मामलों में कर्मचारी को नियोक्ता द्वारा दिए जाने वाले विभिन्न भत्तों या अनुलाभों में नियोक्ता को फ्रिंज बेनेफिट के रूप में दिए गए लाभों के संबंध में अनुमानत: 7 प्रतिशत एफबीटी का भुगतान करना पड़ता था। अब एफबीटी को पूरी तरह खत्म किया जा चुका है। इसलिए ज्यादातर मामलों में ऐसे लाभों की गणना कर्मचारी की वेतन आय में जोड़ कर की जाएगी तथा कर्मचारी को अपनी आय में जोड़े गए ऐसे लाभों और भत्तों पर आयकर का भुगतान करना होगा। शैक्षिक, शोध एवं प्रशिक्षण भत्ता भी टैक्स फ्री होंगे। यूनिफॉर्म का खर्च भी टैक्स बचाएगा।
 
सेंसेक्स ने दिया युवा पीढ़ी को सबक
यूं तो सेंसेक्स के बारे में हमेशा ही कहा जाता है कि इसमें उतार-चढ़ाव होना आम बात है। लेकिन इस साल सेंसेक्स में उतार-चढ़ाव बेहद नाटकीय अंदाज में हुआ। पिछले वर्ष अक्तूबर में सेंसेक्स में गिरावट शुरू हुई और जनवरी 2009 में ये चरम पर पहुंच गई। कई रिटेल निवेशकों को अपनी पूंजी गंवानी पड़ी। युवा पीढ़ी के लिहाज से ये जरूरी है कि वह इससे सबक ले।
 
रियल एस्टेट रेगुलेटर
जिस तरह बिजली या दूरसंचार सेक्टर में प्राइवेट खिलाड़ियों को नियंत्रित करने के लिए सरकार ने रेगुलेटरी अथॉरिटी बनाई हुई है, उसी तरह रियल एस्टेट बाजार में भी स्वतंत्र नियामक तंत्र बनाने की तैयारी सरकार कर रही है। इस रेगुलेटर का काम शरारती और बेईमान बिल्डरों पर अंकुश रखना होगा। शुक्रवार 25 सितंबर को इस विधेयक का ड्राफ्ट इंडस्ट्री के बीच पेश हुआ है। उसके चार मुख्य प्रस्ताव इस प्रकार हैं। किसी भी प्रोजेक्ट को लांच करने से पहले उसका रेगुलेटर ऑफिस में रजिस्ट्रेशन कराना होगा। रजिस्ट्रेशन तब तक नहीं होगा जब तक बिल्डर विभिन्न सरकारी मंजूरियों और सेंक्शन प्लान्स के कागजात रेगुलेटर के पास जमा नहीं करा देता। जब तक बिल्डर प्रॉपर्टी खरीदने वाली पार्टी के साथ सेल एग्रीमेंट नहीं कर लेता, तब तक वह किसी तरह की एडवांस रकम या डिपॉजिट खरीदार से नहीं ले सकता।

नई पेंशन स्कीम
पेंशन फंड रेगुलेटरी एंड डेवलपमेंट अथॉरिटी (पीएफआरडीए) ने सरकारी और गैर-सरकारी कर्मचारियों के लिए नए पेंशन सिस्टम में टीयर 2 अकाउंट लांच किया है। टीयर 2 अकाउंट में लचीलेपन को और बढ़ाया गया है।
 
टेलीकॉम बाजार में घमासान
इस साल टेलीकॉम बाजार में कंपनियों के बीच कीमतों को लेकर युद्ध जारी रहा। इसका अंदाजा आप इसी से लगा सकते हैं कि देश में करीब 2500 प्लान है और औसतन एक सर्कल/क्षेत्र में 250 प्लान चल रहे हैं। इनमें प्रति सेकेंड वाले प्लान, जो आधे पैसे तक की स्पर्धा पर उतर चुके हैं, सबसे किफायती हैं।

बदलेगा शेयर बाजार का समय
अगले वर्ष चार जनवरी से शेयर मार्केट का समय  बदल जाएगा। इस 17 दिसंबर को सेबी की बैठक में ये फैसला लिया गया। एनएसई/बीएसई में कारोबार की शुरुआत 9 बजे से होगी। 4 जनवरी से पहले तक एनएसई/बीएसई में कारोबार 9:55 पर ही शुरू हो जाया करेगा। 
 
जीडीपी
आर्थिक मंदी का असर पहली तिमाही में जीडीपी में देखने को मिला, लेकिन भारत की जीडीपी 6.1 प्रतिशत की दर से बढ़ती रही। बढ़ती घरेलू मांग, सरकार के प्रोत्साहन पैकेज और विदेशी निवेश से 2009 की अंतिम तिमाही में जीडीपी 7.9 प्रतिशत की दर से बढ़ी।
 
मुद्रास्फीति
डब्लयूपीआई (थोक मूल्य सूचकांक) आधारित मुद्रास्फीति 2009 में मंद पड़ी और जीरो लेवल से नीचे चली गई, लेकिन फिर भी पूरे साल महंगाई ने थमने का नाम नहीं लिया। इस वर्ष सरकार ने कहा कि महंगाई के आंकड़े साप्ताहिक के बजाय मासिक तौर पर जारी किए जाएंगे। इस साल फूड इंफ्लेशन का आंकड़ा सुर्खियों में रहा। कुछ साप्ताह पहले ही आपने फूड इंफ्लेशन के 17 फीसदी से पार चले जाने की खबर पढ़ी होगी। मीडिया को बहुत बाद में समय आया कि आम आदमी का वास्ता दाल रोटी और सब्जी वगैरह जैसी चीजों से पड़ता है इसलिए खाद्य वस्तुओं की महंगाई को ही उभारना चाहिए।

इंडस्ट्रियल प्रोडक्शन
मई, 2009 तक इंडेक्स इंडस्ट्रियल प्रोडक्शन (आईआईपी) 5 प्रतिशत से ऊपर रहा। हालांकि सरकार के लगातार प्रोत्साहन, विदेशी निवेश, घरेलू क्रेडिट मार्केट के लगातार बेहतर करने का फर्क आईआईपी पर देखने को मिला।
 
आयकर की स्लैब
बजट में कहा गया कि आयकर पुरुष (65 वर्ष से कम) के लोगों को 160000 रुपए और महिलाओं को 190000 तक कर अदा नहीं करना होगा। वरिष्ठ नागरिकों को 240,000 तक कोई कर नहीं देना पड़ेगा।

नौकरियों के बाजार में फिर से लौटी बहार
साल के जाते-जाते मंदी बाजार में फिर से बहार लौटती दिखाई दी। हालांकि भारत में मंदी का फर्क अन्य देशों की तुलना में कम रहा है लेकिन नई भर्तियों पर लगाम जरूर लग गई। लेकिन दीवाली के बाद से जॉब मार्केट में फिर से रौनक लौट आई। हाल में मैनपावर की रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि आने वाले साल में नौकरियों की संभावनाएं कई सेक्टरों में बनेगी।

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