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केंद्र-राज्य संबंध

केंद्र-राज्य संबंध से अभिप्राय है कि  किसी लोकतांत्रिक राष्ट्रीय-राज्य में संघवादी केंद्र और उसकी इकाइयों के बीच के आपसी संबंध। दुनियाभर में लोकतंत्र के उदय के साथ राजनीति में केंद्र-राज्य संबंधों को एक नई परिभाषा मिली। भारत में आजादी के बाद से केंद्र-राज्य संबंध का मसला अत्याधिक संवेदनशील मामला रहा है। 

मुद्दा चाहे अलग भाषाई पहचान,आसमान विकास, राज्यों के गठन का हो, पु़नर्गठन का हो या फिर विशेष राज्य का दर्जा देने से जुड़ा हो। ये सब केंद्र-राज्य संबंधों की सीमा में आते हैं। यही नहीं देश में शिक्षा, व्यापार जैसे विषयों पर नीति निर्माण का सवाल हो उसमें जो बात फोकस में रहती है वह है केंद्र और राज्य के बीच में इनको लेकर क्या आपसी समझ है।

भारतीय संविधान में भारत को राज्यों का संघ कहा गया है न कि संघवादी राज्य। भारतीय संविधान में विधायी, प्रशासिनिक और वित्तीय शक्तियों का सुस्पष्ट बंटवारा केंद्र और राज्यों के बीच किया है। विधायी शक्ति के विषयों को तीन सूचियों में बांटा गया है। इसमें पहली सूची है केंद्रीय सूची, दूसरी है राज्य सूची  और तीसरी सूची है समवर्त्ती सूची।

केंद्रीय सूची में वे विषय शामिल किए गए हैं जिन पर सिर्फ केंद्र सरकार कानून बना सकती है। इस सूची में राष्ट्रीय महत्व के विषय शामिल किए गए है जैसे कि प्रतिरक्षा, विदेश संबंध, मुद्रा, संचार और वित्तीय मामले आदि। राज्य सूची में  कानून और व्यवस्था, जन स्वास्थ्य, प्रशासन जैसे स्थानीय महत्व के विषयों को शामिल किया गया है। समवर्त्ती सूची में उन विषयों को शामिल किया गया है जिनपर केंद्र ओर राज्य दोनों ही कानून बना सकते हैं। कोई राज्य सरकार केंद्र के द्वारा बनाए गए कानूनों व नीति के विरोध में या फिर विपरीत कानून नहीं बना सकती है। संविधान के अनुछेद 256व 355 में केंद्र को शक्तिशाली बनाया गया है।

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