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मेंहदी आती है कासिम तुम्हारी..

साज सामानों से सजी बारात में रोते हुए बाराती, शहनाई व शाही बैण्ड की मातमी धुन रात के अंधेरे में इस रौशन बारात की कहानी बयाँ कर रही है। स्याह लिबास में मायूस गमजदा अजादार अपने दुल्हे की मेंहदी के साथ-साथ आगे तो बढ़ रहे हैं मगर सिसकियों के साथ आँसू भी जारी है।

इसी रंज ओ गम के माहौल के साथ शुक्रवार को ऐतिहासिक बड़े इमामबाड़े से सातवीं मोहर्रम की रात हजरत कासिम की मेंहदी का जुलूस परम्परागत तरीके से निकाला गया। जुलूस देर रात छोटे इमामबाड़े में मातमी सदाओं के साथ सम्पन्न हो गया।

शहनाई वादक, बैण्ड व नौहाख्वानों के दस्तों से बस यह ही सदा गूंज रही थी ..रोके खेमे से जैनब पुकारी आज मेंहदी है कासिम तुम्हारी, जाऊँ सौ बार मैं तुम पर वारी, लाओ जल्दी से दुल्हा बनाऊँ तेरी बारात को मैं सजाऊँ, घर में बैठी है दुल्हन बेचारी..रोके कहने लगा जर्रा जर्रा, आसमाँ से लहू आज बरसा, कोई खेमे से बीवी पुकारी..आज मेंहदी है कासिम तुम्हारी..आज मेंहदी है कासिम तुम्हारी।

दरअसल यह नौहा उस शबे आशूर की याद दिला रहा है जब हजरत इमाम हसन के बेटे हजरत कासिम का निकाह हजरत इमाम हुसैन की बेटी फातिमा कुबरा से हुआ। दूसरे दिन ही दस मोहर्रम को इस कमसिन दुल्हे हजरत कासिम ने कर्बला में उम्मत-ए-रसूल की हिफाजत करते हुए शहादत हासिल की।

हुसैनाबाद ट्रस्ट की ओर से निकाले गए जुलूस में इन मातमी धुनों से माहौल गमगीन हो गया। जुलूस में हाथी, ऊँट पर निशाने नुकरा ताज, माही, शैरदहा, सूरज, चाँद लिए अजादार सवार थे। रौशन चौकी के साथ गले में कफनी पहने बच्चों हाथों में मोरपंखी, मेंहदी, सीनीख्वान से ढके मेवा व फल के थाल व अराइश लिए हुए थे।

इस जुलूस में बारात पर जाने वाले सुहाग पूरे के साथ बीस फुट कश्तीनुमा सजी मेंहदी हजरत कासिम, हजरत इमाम हुसैन की सवारी जुलजनहा, हजरत अब्बास का अलम के अलावा मासूम अली असगर का झूला भी था। इन सबके आगे शाही बैण्ड हजरत कासिम की मेंहदी का ऐलान कर रहा था।

जुलूस का नेतृत्व कर रहे हुसैनाबाद ट्रस्ट के चेयरमैन व जिलाधिकारी अमित कुमार घोष, ट्रस्ट के सचिव अपरजिलाधिकारी पश्चिम ओपी पाठक, राज्य निर्वाचन आयोग के संयुक्त आयुक्त जेपी सिंह के अलावा एसएसपी प्रेम प्रकाश व अन्य जिला प्रशासन के आलाधिकारी मौजूद रहे।

देर रात शाही मेंहदी का जुलूस छोटे इमामबाड़े पहुँचकर सम्पन्न हो गया। उधर, अजादारी के मरकज लखनऊ में पूरे दिन हजरत कासिम की याद में मजलिस व मातम का दौर जारी रहा। नगे पाँव अजादारों ने मजलिस व मातम के दौरान जगह-जगह सबीलें लगा कर कर्बला वालों की प्यास को याद किया।

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