class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

लीडा के लिए जमीन अधिग्रहण में लगा ग्रहण

लखनऊ इंड्रस्ट्रीयल डेवलपमेंट अथारिटी (लीडा) ने लखनऊ से लेकर जाजमऊ (उन्नाव) तक के करीब सौ गाँव अधिग्रहीत करने का निर्णय लिया है। अधिग्रहण की शुरुआत में ही बाधाएँ ही बाधाएँ सामने आ रही हैं। गाँव वालों ने जमीन अधिग्रहण का विरोध शुरू दिया है जिससे अधिग्रहण की कार्यवाही बीच में ही रुक गई है।

यहाँ के एक भी किसान की जमीन अधिग्रहित नहीं हो पाई है। हाँ शासन ने ग्राम समाज की एक हजार एकड़ जमीन सीधे लीडा के नाम दर्ज कर दी है। लेकिन किसानों की जमीन अधिग्रहण करने में अफसरों के पसीने छूट रहे हैं। किसान बाजार मूल्य पर भूमि की कीमत माँग रहे हैं और ऊपर से नोएडा की तर्ज पर फैक्ट्रियों में किसानों का शेयर और नौकरी की गारंटी भी।

सरकार ने अधिग्रहण के लिए धारा नौ की कार्यवाही की, वह भी चार गाँवों के लिए। उसमें भी किसान सड़क भड़क उठे हैं। उनका कहना है कि अभी इन गाँवों की जमीन का मामला भूमि प्रबन्धक समिति ने तय नहीं किया है। यहाँ सारा काम संविधान के 73वें संशोधन के तहत पंचायती राज के जरिए चल रहा है, इसलिए दोहरी व्यवस्था होने का सवाल ही नहीं उठता।

सरकार सीधे कोई कार्यवाही नहीं कर सकती। इससे संविधान की मंशा को ठेस पहुँचती है। अब मामला कोर्ट ही तय करेगा। पहले चरण में लीडा को जिन गाँवों की ग्राम समाज की जमीन दी गई उनमें मिरानपुर तीनवत, नटकुर, कुरौनी, बंथरा शामिल हैं। न चार गाँवों के ग्राम समाज की जमीन लीडा के नाम खतौनी में दर्ज की गई है उसमें ऊसर, बंजर और आबादी की जमीनें शामिल हैं।

यहाँ की कृषि उपयोग जमीन देने के लिए किसान तैयार नहीं हैं। गाँव वालों का कहना है कि इन गाँवों में कोई बड़ा खेतिहर नहीं है। ये सब जीविका चलाने के लिए खेती कर रहे हैं। अगर खेत चले गए तो वह क्या करेंगे। लीडा प्रभावित किसान संघर्ष मोर्चा के संयोजक जगनायक सिंह चौहान ने बताया कि किसानों की माँग है कि अगर जमीन अधिग्रहित की जाए तो उसका मूल्य नोएडा और गुजरात की तर्ज पर बाजार रेट पर लगाया जाए।

यहाँ लगने वाली फैक्ट्रियों में ग्रामीणों का शेयर हो और उनके परिवार के लोगों को नौकरी दी जाए। श्री चौहान कहते हैं कि ग्रामीण इसलिए भयभीत हैं क्योंकि अमौसी, बेहसा, चिल्लावाँ, अलीनगर सुनहरा गाँव के किसानों का हश्र ग्रामीण देख रहे हैं।

उन्हें जो मुआवजा मिला वह बेटे और बेटियों की पढ़ाई लिखाई और शादी ब्याह में खर्च हो गया। अब वे ट्रकों में मौरंग उतारने और चढ़ाने वाले मजदूर बनकर रह गए हैं। श्री चौहान कहते हैं कि अगर किसानों की मर्जी के बगैर जमीन अधिग्रहित करने की कोशिश की गई तो यहाँ भी सिंगूर जैसा आंदोलन होगा। औद्योगिक विकास के बहाने किसानों का हित नहीं दबने दिया जाएगा।

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:लीडा के लिए जमीन अधिग्रहण में लगा ग्रहण