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फिल्मों में शास्त्रीय संगीत को आबाद रखने वाले थे नौशाद

फिल्मों में शास्त्रीय संगीत को आबाद रखने वाले थे नौशाद

बैजू बावरा, मुगल-ए-आजम और मदर इंडिया जैसी फिल्मों में अपने शानदार संगीत के लिए याद किए जाने वाले भारतीय सिनेमा के महानतम संगीतकारों में से एक नौशाद उन लोगों में से थे, जिन्होंने फिल्म माध्यम में भारतीय शास्त्रीय संगीत का बेहतरीन इस्तेमाल किया और रागों पर आधारित कई दिलकश गाने दिए।

नौशाद अली का जन्म 25 दिसंबर, 1919 को हुआ था। बचपन से ही उन्हें लाइव आर्केस्ट्रा सुनने का शौक था। उन्होंने उस्ताद गुरबत सिंह, उस्ताद युसूफ अली और उस्ताद बब्बन साहब से संगीत की शिक्षा ली। मुंबई आने से पहले नौशाद हारमोनियम की मरम्मत किया करते थे और विंडसर म्यूजिक इंटरटेनर्स के लिए संगीत दिया करते थे।
   
संगीतकार के तौर पर किस्मत आजमाने के इरादे से नौशाद 1930 के दशक के उत्तरार्ध में मुंबई चले आए लेकिन उन्हें शुरूआत में काफी संघर्ष करना पड़ा। संघर्ष के शुरूआती दिनों में उन्हें कई रातें फुटपाथ पर गुजारनी पड़ीं। उसके बाद उन्हें मुश्ताक हुसैन के आर्केस्ट्रा में पियानो बजाने का काम मिला। बाद में नौशाद संगीतकार खेमचंद प्रकाश के सहायक बन गए।

स्वतंत्र संगीतकार के तौर पर नौशाद को पहला मौका फिल्म प्रेम नगर में मिला। लेकिन पहली बार फिल्म शारदा (1942) से लोगों का उन पर ध्यान गया। 1944 में प्रदर्शित रतन फिल्म से नौशाद का सितारा बुलंदियों पर पहुंच गया और वह उस समय के शीर्ष संगीतकारों की कतार में शामिल हो गए।

नौशाद ने इसके बाद एआर कारदार की शाहजहां (1946), दर्द (1947), दिल्लगी (1949), दुलारी (1949), महबूब खान की अनमोल घड़ी (1946), एलान (1947), अनोखी अदा (1948), अंदाज (1949) जैसी फिल्मों में हिट संगीत देकर इंडस्ट्री में अपने पांव जमा लिए।

नौशाद उन शुरूआती संगीतकारों में से थे जिन्होंने लता मंगेशकर को मौका दिया। अंदाज और दुलारी जैसी फिल्मों ने लता के करियर को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। नौशाद उन संगीतकारों में से थे जिन्होंने साउन्ड मिक्सिंग और पार्श्व गायन में म्यूजिक ट्रैक और अलग से आवाज की रिकॉर्डिंग की शुरूआत की थी। वह पहले संगीतकार थे जिन्होंने फिल्म संगीत में बांसुरी, सितार, सारंगी का एक साथ इस्तेमाल किया। वह फिल्मों में पार्श्व संगीत का भी इस्तेमाल करने वाले शुरूआती संगीतकारों में से थे।
   
उन्होंने अपने संगीत में भारतीय शास्त्रीय संगीत और रागों का बखूबी इस्तेमाल किया। नौशाद ने बैजू बावरा में उस्ताद आमिर खान और डीवी पलुस्कर जैसी शास्त्रीय संगीत की बड़ी हस्तियों के जरिए गीत प्रस्तुत किये तो मुगल-ए-आजम में बड़े गुलाम अली का गायन लोगों ने बहुत पसंद किया।

नौशाद ने दिलीप कुमार की ज्यादातर फिल्मों में संगीत दिया इसलिए हिंदी फिल्मों के ट्रेजेडी किंग के युग का जैसे-जैसे अंत हुआ, नौशाद का भी फिल्मों में संगीत आना कम हो गया।

गुलाम मोहम्मद की मृत्यु के बाद नौशाद ने हालांकि पाकीजा (1972) का संगीत पूरा किया, जिसके गीत आज भी श्रोताओं को याद हैं। 1990 के दशक तक नौशाद इक्का-दुक्का फिल्मों में संगीत देते रहे लेकिन वो अपना पुराना जादू नहीं दोहरा सके। उनकी आखिरी फिल्म अकबर खान की ताज महल- एन इटरनल लव स्टोरी (2005) थी। उन्हें संगीत के क्षेत्र में योगदान के लिए दादा साहब फाल्के पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया।
नौशाद का पांच मई, 2006 को दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया।

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