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देश के आंतरिक पुनर्गठन का वक्त

छोटा हमेशा सुंदर नहीं होता। जब देश में राज्यों के पुनर्गठन की बात हो तो यही सच है। छोटे राज्यों का अर्थ बेहतर प्रशासन, ऊंचे स्तर पर आसान पहुंच और शिकायतों का तुरंत निपटान है, यह तर्क कई तरह से गलत है। इसमें यह माना जाता है कि बड़े राज्य, वे हमेशा ही खराब प्रशासन में रहेंगे। इस तर्क में सरकार चलाने, संस्थान बनाने वगैरा का दोगुना खर्च और उसका अपर्याप्त लाभ नजरअंदाज कर दिया जाता है।दूसरे, अगर बड़े राज्यों का प्रशासन सुधारा जाए तो उसका लाभ ज्यादा लोगों तक पहुंचेगा।

ये सारे मुद्दे आंध्र प्रदेश का विभाजन करके तेलंगाना राज्य बनाने के फैसले की वजह से फिर सामने आए हैं। इस फैसले से राज्यों के पुनर्गठन, उसके राजनैतिक आधार और आर्थिक तर्क के व्यापक मुद्दे फिर खड़े हो गए हैं। तार्किक फैसले करने के लिए व्यापक राष्ट्रीय सहमति की जरूरत होती है। जब अंग्रेजों ने भारत छोड़ा, तो पहले उन्होंने भारत को विभाजित कर दिया था और पाकिस्तान का निर्माण हुआ था, जो विभाजित होकर बांग्लादेश बना। राष्ट्रीय सीमाओं के मामले पाकिस्तान और चीन के दावों की वजह से लगातार दिक्कत दे रहे हैं। इसी के साथ भारत के अंदर प्रशासनिक सीमाओं का मामला भी अनिर्णीत है।

नये भाषावार प्रांतों के निर्माण के लिए राजनीतिक आंदोलन आजादी के बाद शुरू हुए। मद्रास प्रांत के उत्तरी तेलुगू भाषी हिस्से से नया राज्य बनाने के आंदोलन ने राज्यों के लिए भाषिक समानता का बेहद संदेहास्पद पैमाना बना डाला। साफ है कि यह फामरूला काम नहीं कर रहा है, यहां तक कि आंध्र प्रदेश में जो भाषा के आधार पर बना था। तेलंगाना के समर्थक और उनके विरोधी दोनों ही तेलुगू भाषी हैं। जाहिर है कि बाकी आंध्रवासी भी नाराज हैं। एकीकृत आंध्र के पक्षधर अड़े हुए हैं कि राज्य का विभाजन नहीं होगा और इनमें कांग्रेसी भी हैं।

तेलंगाना राज्य की घोषणा ने ऐसी और भी मांगें पुनर्जीवित कर दी हैं। कहीं हरित प्रदेश, बुंदेलखंड और पूर्वाचल राज्य तो कहीं विदर्भ और गोरखालैंड की। इन सारे आंदोलनों ने भाषागत समानता के पैमाने को निर्थक बना दिया है। अब एक ही भाषा बोलने वाले लोग अलग-अलग राज्यों के लिए लड़ रहे हैं। इससे प्रशासनिक सीमाएं बनाने के लिए किसी तर्कसंगत आधार का मुद्दा फिर खड़ा हो जाता है। इसमें पांच तरह के मुद्दे उठते हैं। पहला, चूंकि नये राज्य बनाने के किसी भी सुझाव के साथ भावनात्मक मुद्दे उठते हैं और तरह तरह की फूट पैदा होती है। इसलिए यथास्थिति का तर्क मजबूत है। चूंकि धर्म, जाति, भाषा, विकास, प्रशासनिक सुविधा आदि के आधार पर अलग राज्य मांगे जा सकते हैं इसलिए विभाजन एक अंतहीन प्रक्रिया हो सकती है। यथास्थिति के पक्ष में यह भी तर्क दिया जा सकता है कि अलग अलग इलाकों के लिए ज्यादा स्वायत्तता और उपेक्षित इलाकों के विकास के लिए विशेष कोशिशें मौजूदा ढांचे में ही शामिल की जा सकती हैं।

दूसरा, छोटे राज्यों में बेहतर प्रशासन का तर्क हरियाणा में देखा जा सकता है, पंजाब से अलग होने के बाद जिसकी आर्थिक तरक्की ज्यादा हुई। इसके अलावा उत्तराखण्ड, छत्तीसगढ़ और झारखण्ड में भी अपने मूल राज्यों से ज्यादा तेज तरक्की हुई, ऐसा अर्थशास्त्री कहते हैं। झारखंड में खराब प्रशासन और व्यापक भ्रष्टाचार के बावजूद ऐसा हुआ।  तर्क यह दिया जाता है कि छोटे राज्यों में नीति निर्माताओं को ज्यादा ध्यान देने का मौका मिलता है, प्रशासनिक फैसले तेज होते हैं और प्रशासन जनता के ज्यादा करीब आता है।

तीसरे, विशेषज्ञों का कहना है कि भारत की जनसंख्या 1947 में 36 करोड़ थी जो 2001 के जनगणना आंकड़ों के हिसाब से एक अरब दो करोड़ हो गई और अभी एक अरब बीस करोड़ हो सकती है। इसलिए यह तर्क दिया जा सकता है कि पांच करोड़ जनसंख्या के लिए अलग प्रशासनिक इकाई होनी चाहिए जिसका भौगोलिक दायरा 50 हजार वर्ग किलोमीटर हो। जनसंख्या और भूगोल का तर्क इसलिए गड़बड़ है क्योंकि कभी-कभी कम जनसंख्या में भी ऐसे जातीय भेद होते हैं जिनके लिए अलग इकाइयों की जरूरत पड़े। इसी तरह सारी दुनिया में महानगरों का अपना स्वायत्त प्रशासन तंत्र होता है, हालांकि इसके अपने नुकसान हैं।

चौथे, यूरोप और दुनिया के दूसरे हिस्सों में भाषागत विभाजन का तर्क 1953 के राज्य पुनर्गठन आयोग के लिए बुनियादी विचार था। लेकिन अगले विभाजन जातीय विशेषताओं के आधार पर हुए। जैसे छत्तीसगढ़ और झारखंड में आदिवासी जनसंख्या और उत्तराखंड में पहाड़ी लोगों का होना। फिर फामरूला भाषिक समानता होनी चहिए या जातीयता? अफसोस यह है कि तेलंगाना इन दोनों श्रेणियों में नहीं आता क्योंकि सारे आंध्र प्रदेश में तेलुगू बोली जाती है और कोई जातीय फर्क भी नहीं है। बेशक तेलंगाना इलाके के लोगों का कहना है कि उनकी विकास संबंधी उपेक्षा हुई है लेकिन इसका अर्थ है कि यह आंतरिक विरोधाभास है जिन्हें हल किया जाना चाहिए।

पांचवां, आर्थिक स्वावलंबन तार्किक पुनर्गठन का एक और जरिया हो सकता है। जैसे बिहार से अलग हुआ झारखंड खनिज सम्पदा के मामले में समृद्ध है और उसमें जातीय विशिष्टता भी है, लेकिन उसकी आबादी कम है। दूसरी ओर बिहार में जनसंख्या का घनत्व ज्यादा है और झारखंड के प्राकृतिक साधनों का बेहतरीन इस्तेमाल करके ज्यादा बड़ी जनसंख्या को लाभ हो सकता है। ऐसा पहले नहीं हुआ इसका अर्थ यह नहीं है कि आर्थिक रूप से अतार्किक और कम जनसंख्या घनत्व वाली इकाइयों को बनाया जाये और आर्थिक रूप से फायदेमंद इकाइयों को बनाने की कोशिश ही न की जाय।

प्रशासनिक सीमाएं बनाना स्वतंत्र राष्ट्र बनाने जितना ही बड़ा भावनात्मक मुद्दा हो सकता है। इसका कोई सहज स्वीकार्य पैमाना नहीं है। भारतीय राज्यों के पुनर्गठन में आर्थिक संघीयता के जटिल मुद्दे खड़े हो जाते हैं। भारत में ज्यादा से ज्यादा कितने राज्य हो सकते हैं इस सवाल के कई उत्तर हो सकते हैं, जो इस पर निर्भर करते हैं कि आप किस चश्मे से देखते हैं। भावनाओं से राजनीति और राजनीति से अर्थशास्त्र को अलग करना आसान नहीं है। विभाजन का तर्क जितना मजबूत है उतना ही पुर्नसयोजन का हो सकता है। सहमति बनाने के लिए धीरज चाहिए और वक्त भी।

तुरत-फुरत समाधान ज्यादा समस्याएं पैदा करता है और हल की ओर नहीं ले जाता। दूसरा राज्य पुनर्गठन आयोग बनाने के लिए पुख्ता तर्क है, लेकिन इस आयोग को विभाजन के साथ साथ विलय की भी सोचनी चहिए। उसे एक लचीली सहमति बनानी पड़ेगी जो प्रशासनिक सुविधा, भाषिक समानता, जातीयता और सबसे ऊपर आर्थिक लाभ पर आधारित हो। यह भारत के आंतरिक पुनर्गठन का वक्त है।

लेखक संसद सदस्य हैं और योजना आयोग के सदस्य रह चुके हैं

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