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उत्तर प्रदेश : कैसे हो नए राज्यों का निर्माण

उत्तर प्रदेश को तीन या चार राज्यों में विभाजित करने के कुछ महत्वपूर्ण आर्थिक पहलू हैं। ये इस प्रदेश के सतत विकास और लोगों की खुशहाली के लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण हैं। उत्तर प्रदेश की अर्थव्यवस्था का पहला महत्वपूर्ण आयाम है उद्योग, दूसरा है कृषि और तीसरा है पर्यटन तथा अन्य आर्थिक गतिविधियाँ। विभाजन हुआ तो उत्तर प्रदेश के पचास प्रतिशत से ज्यादा उद्योग पश्चिमी उत्तर प्रदेश में चले जाएँगे, यदि बड़े उद्योगों की बात की जाए, तो इनका प्रतिशत और भी ज्यादा होगा।

कृषि तथा उसके संसाधन भी पचास प्रतिशत के लगभग पश्चिमी उत्तर प्रदेश में चले जाएँगे। मथुरा के चलते धार्मिक पर्यटन तथा आगरा के चलते ऐतिहासिक पर्यटन का एक बड़ा हिस्सा पश्चिमी उत्तर प्रदेश में चला जाएगा। सरकार के संसाधनों के दृष्टिकोण से गाजियाबाद, मेरठ, नोएडा तथा पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुछ बड़े शहर आज के उत्तर प्रदेश के राजस्व का एक बड़ा हिस्सा जुटाते हैं। यह सब मिलकर के एक नए आर्थिक सुपरपावर को जन्म देने की संभावना संजोता है।

बुन्देलखंड की परिकल्पना सिर्फ उत्तर प्रदेश के सात जिलों से नहीं की जा सकती। बुन्देलखंड राज्य के लिए मध्य प्रदेश के कम से कम छह जिलों का इस राज्य में शामिल किया जाना लगभग अनिवार्य-सा प्रतीत होता है। ऐसी अवस्था में बुन्देलखंड राज्य को उत्तर प्रदेश के लगभग 4 या 5 प्रतिशत उद्योग मिलेंगे, जिसमें ज्यादातर छोटे उद्योग होंगे। उत्तर प्रदेश की कृषि का एक नगण्य हिस्सा ही इस प्रदेश को प्राप्त होगा, लेकिन ग्वालियर, सागर इत्यादि के जुड़ने से एक कृषि का क्षेत्र तथा कुछ उद्योग मध्य प्रदेश से भी इस प्रदेश में जुड़ जाते हैं। साथ ही ललितपुर, झाँसी के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण साइट्रस बेल्ट नागपुर की तर्ज पर विकसित की जा सकती है, जो इस प्रदेश के हॉर्टिकल्चर को ‘इंजन आफ ग्रोथ’ के रूप में परिवर्तित कर सकते हैं।

पर्यटन इस नए प्रदेश की महत्वपूर्ण संभावना के रूप में उभर कर सामने आता है। खजुराहो, ग्वालियर, झाँसी, चित्रकूट, ओरछा ये सब अपने में पर्यटन केंद्र हैं। उत्तर प्रदेश के एक लाख 40 हजार करोड़ का एक बड़ा अंश इस क्षेत्र की गरीबी उन्मूलन के लिए सालाना तौर पर खर्च किया गया है। बुन्देलखंड के एक अलग प्रदेश बनने के बाद नए राज्य के पास इस तरीके के बजटीय संसाधन नहीं उपलब्ध होंगे। राजस्व, कृषि तथा उद्योग तुलनात्मक तौर पर इस क्षेत्र की कमजोरी ही दिखाई देते हैं। शुरू के कुछ साल तक इस नए प्रदेश को केन्द्र सरकार से एक सपोर्ट पैकेज की आवश्यकता जरूर होगी। बाकी बचे उत्तर प्रदेश यानी पूर्वी उत्तर प्रदेश तथा मध्य उत्तर प्रदेश को मिलाकर यदि एक राज्य बनाया जाता है, तो यह एक सशक्त और सफल प्रदेश प्रतीत होता है।
इस नए राज्य में 35-36 प्रतिशत उद्योग और प्रदेश की लगभग आधी कृषि सम्पदा समाहित होगी। पर्यटन के दृष्टिकोण से धार्मिक पर्यटन तथा लगभग पूरा बुद्धिष्ट सर्किट इस नए प्रदेश को एक अत्यन्त ही सफल पर्यटन क्षेत्र के रूप में इंगित करता है। इस नए प्रदेश के कृषि प्रदेश में छोटी जोतें तथा निम्न उत्पादकता बड़ी समस्याएँ दिखती हैं। दूरदर्शी मार्केटिंग तथा फूड प्रोसेसिंग जैसे प्रयासों से कृषि क्षेत्र में अपार संभावनाएँ सृजित की जा सकती हैं। इस नए प्रदेश में ऊर्जा की भी एक बहुत बड़ी संभावना दिखाई देती है। पूरे उत्तर प्रदेश के ज्यादातर पावर प्लांट इसी नए प्रदेश को प्राप्त होंगे। ये अपने आप में अपार संभावनाओं को जन्म देता है, मसलन यह एक ऐसा प्रदेश होगा, जिसमें थोड़े ही प्रयास से ऊर्जा क्षेत्र में आत्मनिर्भर होने की क्षमता हो सकती है।

आज के उत्तर प्रदेश में ऊर्जा का अनुपलब्धता कृषि और उद्योग के कम विकास का एक बड़ा कारण है। इस नए प्रदेश में वाराणसी, लखनऊ, कानपुर जैसे बड़ा राजस्व सृजित करने वाले शहर हैं। इनके चलते तथा अर्थ व्यवस्था के अन्य आयामों के चलते यह प्रदेश राजस्व के दृष्टिकोण से भी एक सक्षम प्रदेश बन सकता है। यह प्रदेश पश्चिम उत्तर प्रदेश की ही तरह भारत के आर्थिक रूप से सशक्त प्रदेशों की श्रृंखला में खड़ा हो सकता है।

यदि उत्तर प्रदेश को चार राज्यों में विभाजित किया गया है यानी पूर्वाचल और मध्य उत्तर प्रदेश को अलग-अलग राज्य बनाया या तो ये दोनों ही राज्य तुलनात्मक तौर पर कमजोर राज्य बन जाएँगे और इन दोनों को ही सतत विकास के मार्ग पर बनाये रखने के लिए पैकेज के रूप में बैसाखी लगानी पड़ेगी। प्रदेश को तीन हिस्सों में विभाजित करना एक अच्छा कदम हो सकता है, लेकिन इसको चार हिस्सों में विभाजित किया जाना आर्थिक रूप से एक अच्छा निर्णय नहीं होगा।

लेखक वरिष्ठ अर्थशास्त्री हैं

hindustanfeedback@gmail.com

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