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तारीफ करें.. पर कैसे

तारीफ लगभग हर किसी को पसंद होती है। हम-आप भी करते रहते हैं। कभी मातहत की तो कभी अफसर की.. और पत्नी की तो अक्सर ही। कभी सच्ची और ज्यादातर झूठी। व्यावहारिक यथार्थ ही ऐसा है। लेकिन ऐसा भी होता है कि हम सामने वाले की तारीफ पूरे मन से करते हैं, वाकई उसे प्रसन्न करना चाहते हैं.. और बदले में मिलती है झिड़की।

रविवार का दिन था। सरिता ने हमेशा की तरह राजमा और पुलाव पकाया। राजेश हमेशा की तरह उसकी तारीफों के पुल बांधने लगा, ‘तुम्हारे बनाए राजमा तो फैन्टास्टिक हैं.. और पुलाव, यह तो इतना लाजवाब है कि बनाने वाली की उंगलियां चूम लूं।’ हमेशा राजेश उसकी इसी तरह तारीफ करता था, और सरिता के गाल खुशी से लाल हो जाते थे। पर उस दिन ऐसा नहीं हुआ। सरिता ने मुंह फुला लिया, ‘जाओ, अब ऐसी बकवास से नहीं रीझने वाली। राजमा फैन्टास्टिक, पुलाव लाजवाब। मगर हलुआ तो तुम्हें अपनी मां का बनाया ही अच्छा लगता है न, क्यों? आज मैंने इतने मन से बनाया तो एक शब्द भी नहीं फूटा तुम्हारे मुंह से।’

गलती कहां हुई? हमारा संवाद चार स्थितियों में होता है। कभी हम अपने दिल से संवाद करते हैं और सामने वाला भी उसे दिल से सुनता है। कभी हम दिमाग से संवाद करते हैं और सामने वाला भी उसे अपने इंटलेक्ट से सुनता है। कभी हम तो दिमाग से बात करते हैं पर सामने वाला उसे दिल से सुनता है। और एक स्थिति यह भी है कि हम तो दिल से बात करते हैं लेकिन सामने वाला उसे दिमाग से सुनता है। यहां चौथे प्रकार की स्थिति हुई। राजेश ने अपने दिल से, भावनाओं से विभोर होकर पत्नी की प्रशंसा की, लेकिन पत्नी ने उसे भावनात्मक स्तर पर लेने के बजाय बुद्धि और तर्क के स्तर पर सुना और बात बिगड़ गई। तो आइन्दा कभी प्रशंसा करें तो इस बात का खास ध्यान रखें कि सामने वाला उसे किस स्तर पर ले रहा है।

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