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खाली ही रही बच्चों की झोली

खाली ही रही बच्चों की झोली

इस साल के शुरू में ही एक ऐसी फिल्म आ गई थी, जिसके प्रमुख किरदार बच्चे थे। लेकिन क्या आप इस फिल्म को बच्चोंके लिए बनी फिल्म कहेंगे? यहां बात हो रही है डैनी बोएल की फिल्म ‘स्लमडॉग मिलिनेयर’ की। मुंबई की झोंपड़पट्टी के कुछ बच्चोंकी इस कहानी में वहीं से लिए गए कुछ बच्चोंको लेकर बनी इस फिल्म ने दुनियाभर में कामयाबी और ऑस्कर समेत ढेरों पुरस्कार बटोरे और अपने यहां भी बच्चोंव बड़ों को पसंद आई। लेकिन सच तो यही है कि इसकी कहानी बच्चोंके लिए नहीं थी। फिर ‘बिल्लू’ आई, जिसके नायक बिल्लू हज्जाम की कहानी में उसके दोनों बच्चोंका भी खासा रोल था। बेबी मिताली मायेकर और मास्टर प्रतीक दलवी ने अपनी भूमिकाओं को कायदे से निभाया भी। लेकिन यह फिल्म भी बड़ों के मतलब की ही निकली।

बाल-कलाकारों को लेकर एक बहुत अच्छी फिल्म ‘सिकंदर’ की शक्ल में आई। कश्मीर के आतंकवाद की पृष्ठभूमि में कही गई इस कहानी में 13-14 साल की उम्र के दो बच्चोंपर उस आतंकवाद के पड़ते प्रत्यक्ष-परोक्ष प्रभाव का उम्दा चित्रण करती यह फिल्म भी बच्चोंके बारे में ही थी, न कि उनके लिए। मगर इसके आने और जाने का पता ही नहीं चला।
  
एक बात इस साल खास तौर पर देखने में आई कि बच्चोंके मतलब का सिनेमा अब ‘बड़ा’ हो रहा है। असल में सिर्फ बच्चोंके लिए फिल्में बनाने का चलन अपने यहां कभी ढंग से पनप ही नहीं पाया और इसे बॉक्स-ऑफिस के नजरिए से हमेशा घाटे का सौदा ही समझा गया। यही वजह है कि बच्चोंके लिए अगर कुछ कहने के प्रयास हुए भी तो उनका निशान बड़ी उम्र के या कहें कि किशोर वर्ग पर ज्यादा रहा। सतीश कौशिक की ‘तेरे संग’ को यहां गिना जा सकता है। इसके ढीले प्रस्तुतिकरण के कारण यह टिकट-खिड़की पर कुछ खास नहीं कर पाई। 

यही बात मिथुन चक्रवर्ती वाली ‘चल चलें’ के बारे में भी कही जा सकती है, जो बच्चोंकी पढ़ाई को लेकर उनके माता-पिता द्वारा उन पर डाले जाने वाले दबाव की बात करती है। इस फिल्म के भी आने और जाने का पता नहीं चला। एक अच्छी फिल्म ‘जोर लगा के हय्या’ भी थी, जिसे देखने वालों ने तो इसे पसंद किया, लेकिन यह भी ज्यादा दर्शकों तक नहीं पहुंच पाई। पेड़ों को न काटने का संदेश देती यह फिल्म पर्यावरण को बचाने की बात कहती है और वह भी बिल्कुल सीधे-सरल अंदाज में।
   
बॉबी दियोल वाली ‘वादा रहा’ एक रूसी लोक-कथा पर आधारित थी, जिसमें केंसर से मर रहे एक बच्चे के जरिए जिंदगी को पॉजिटिव नजरिए से देखने का संदेश दिया गया। मास्टर द्विज काक ने बहुत ही बढ़िया ढंग से इस रोल को निभाया। ‘सुना-एक नन्ही आवाज’ एक अजन्मे बच्चे और उसकी मां के आपसी संवादों पर आधारित रही, लेकिन यह फिल्म पूरी तरह से बड़ों के लिए ही थी। हां, ‘मारुति मेरा दोस्त’ सब जगह, सभी तक पहुंच सकी। ‘डिटेक्टिव नानी’ थी तो बच्चोंके लिए, लेकिन यह खराब ढंग से बनाई गई थी। एनिमेशन फिल्म ‘बाल गणेश-2’ बहुत ही बढ़िया बनी होने के बावजूद सिनेमाघरों में कुछ खास नहीं कर सकी।

अमिताभ बच्चन जैसे दिग्गज कलाकार वाली ‘अलादीन’ अगर अच्छे से बनी होती तो जरूर पसंद की जाती। आफताब शिवदासानी वाली ‘आओ विश करें’ एक बच्चे की फटाफट बड़े होने की तमन्ना के बारे में थी। इसी तरह से ‘पा’ हालांकि एक बेहतरीन फिल्म रही, लेकिन वह भी बड़ों के लिए। बाहर से आई फिल्मों को देखें तो ‘आइस एज 3-डायनासोर्स से पंगा’, ‘जी आई जो-कोबरा का कहर’, ‘म्यूजियम के अंदर फिर फंस गया सिकंदर’ या फिर ‘हैरी पॉटर एंड द हॉफ ब्लड प्रिंस’ को शहरी बच्चोंने ज्यादा पसंद किया। बच्चों के मतलब की अच्छी फिल्मों की कमी का ही नतीजा है कि बच्चों ने इस साल भी बड़ों की फिल्मों से काम चलाया।

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