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हर मूड के गीतों को गाने में माहिर थे मोहम्मद रफी

हर मूड के गीतों को गाने में माहिर थे मोहम्मद रफी

भारत के सर्वश्रेष्ठ पार्श्वगायकों में से एक मोहम्मद रफी के गायन में इतनी विविधता थी कि वह सभी तरह के गीतों को अपनी आवाज में उतार-चढ़ाव, शुद्ध उच्चारण और प्रस्तुति के जरिए कुछ खास बना देते थे। चाहे वह शास्त्रीय संगीत पर आधारित गीत हों या दर्द भरे नगमें, मस्ती भरे गीत हों या सुकून भरे गीत, रोमांटिक गीत हों या देशभक्ति की भावना से ओत-प्रोत गीत। अपने इसी हुनर की वजह से एक दौर में वह हिंदी सिनेमा के सभी श्रेष्ठ सितारों की आवाज बन गए थे।

जन्म और फिल्मी करियर
मोहम्मद रफी का जन्म 24 दिसंबर, 1923 को पंजाब के अमृतसर जिले में कोटला सुल्तान सिंह गांव में हुआ था। रफी जब 14 साल के थे तभी वह लाहौर आ गए। वहां उन्होंने खान अब्दुल वहीद खान, जीवन लाल मट्टो और गुलाम अली खान से संगीत की शिक्षा ली। उन्हें रेडियो लाहौर पर गाने का मौका संगीतकार फिरोज निजामी ने दिलवाया। रफी को पार्श्व गायक के तौर पर मौका संगीतकार श्याम सुंदर ने पंजाबी फिल्म गुल बलूच (1941) में दिया।

वह 1944 में मुंबई आ गए। वहां नौशाद ने पहले आप (1944) में उन्हें गाने का मौका दिया। नौशाद ने उन्हें फिल्म अनमोल घड़ी में और गाने का मौका दिया। फिल्म शाहजहां में रफी को सहगल के साथ युगल गीत गाने का मौका मिला। लेकिन रफी को बड़ी सफलता फिरोज निजामी द्वारा संगीतबद्ध और दिलीप कुमार तथा नूरजहां अभिनीत फिल्म जुगनू (1947) से मिली। इस फिल्म का गीत 'यहां बदला वफा का बेवफाई के सिवा क्या है' काफी लोकप्रिय हुआ। यह फिल्म दिलीप कुमार के लिए भी वरदान साबित हुई।

शुरूआत में रफी की गायकी पर जीएम दुर्रानी की गायकी का प्रभाव था। रफी के करियर की गाड़ी 1949 में प्रदर्शित हुई फिल्म दुलारी के गीत 'सुहानी रात ढल चुकी..' से चल निकली। इसका संगीत नौशाद ने दिया था। उसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। रफी तब से लेकर 1970 के दशक की शुरूआत तक पार्श्वगायन के बेताज बादशाह बने रहे।

सफल अभिनेताओं की आवाज
सफलता के आसमान को छूने के बावजूद रफी विनम्र और मृदुभाषी थे और उन्होंने रियाज से कभी मुंह नहीं मोड़ा। रफी ने शराब के नशे में चूर फिल्मी किरदारों के लिए कई बेहतरीन गाने गाए, लेकिन उन्होंने कभी भी खुद शराब को हाथ भी नहीं लगाया।

रफी ने अपनी बेमिसाल गायकी से दिलीप कुमार, देवआनंद, शम्मी कपूर, राजेंद्र कुमार, सुनील दत्त, विश्वजीत, जॉय मुखर्जी, धर्मेंद्र, शशि कपूर और राजकुमार जैसे अभिनेताओं की फिल्मों को कामयाबी दिलाने में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने अभिनेता और गायक किशोर कुमार के लिए भी रागिनी, बागी, शहजादा और शरारत फिल्म में गाने गाए। उन्होंने अपने करियर में उस दौर के सभी बेहतरीन संगीतकारों और साथी पार्श्व गायकों के साथ काम किया, लेकिन संगीतकार नौशाद और एसडी बर्मन के साथ उनकी जोड़ी ने कई यादगार गीत दिए।

नौशाद-बर्मन के साथ दिए हिट
रफी ने नौशाद के साथ दीदार (1951), आन (1952), उड़न खटोला (1955), कोहिनूर (1960), मुगल-ए-आजम (1960), गंगा जमुना और मेरे महबूब जैसी फिल्मों में धमाल मचाया तो एसडी बर्मन के लिए उन्होंने प्यासा (1957), नौ दो ग्यारह (1957), काला पानी (1958), काला बाजार (1961) गाइड (1965) में यादगार गीत दिए।

1960 के दशक के अंत में जब राजेश खन्ना का दौर आया तो किशोर कुमार ने उन्हें सर्वश्रेष्ठ पार्श्व गायक के सिंहासन से बेदखल कर दिया, लेकिन रफी ने हम किसी से कम नहीं (1977) और अमर अकबर एंथनी जैसी फिल्मों से जोरदार वापसी की। उन्हें हम किसी से कम नहीं फिल्म के 'क्या हुआ तेरा वादा..' गाने के लिए फिल्म फेयर और नेशनल अवॉर्ड भी मिला। अपने 40 साल के फिल्म करियर में रफी ने हिंदी के अतिरिक्त उर्दू, भोजपुरी, पंजाबी, बंगाली, मराठी, सिंधी, गुजराती, तेलगू, अंग्रेजी और फारसी भाषाओं में 26 हजार गाने गाए। उन्हें सात बार सर्वश्रेष्ठ पार्श्व गायन के लिए फिल्मफेयर पुरस्कार और चार बार राष्ट्रीय पुरस्कार से नवाजा गया। भारत सरकार ने उन्हें वर्ष 1965 में पद्मश्री से नवाजा था। लेकिन पार्श्वगायन में उनकी जोरदार वापसी लंबे समय तक बरकरार नहीं रही, क्योंकि 31 जुलाई, 1980 को दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया।

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