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जीत का सेहरा किसके सर बांधें

जीत का सेहरा किसके सर बांधें

झारखंड हुआ खंड-खंडः
आज झारखंड एक बार फिर चौराहे पर खड़ा है। विधानसभा के चुनाव परिणाम आ गए हैं। यहां की जनता ने खंडित जनादेश दिया है। किसी भी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं। भाजपा-जदयू गठबंधन को भारी नुकसान, कांग्रेस को अब तक की सबसे बड़ी जीत। लेकिन सत्ता की चाभी दिशोम गुरू के हाथ। छोटी पार्टियों झाविमो और आजसू को भारी सफलता। राजद की जमीन खिसकी। भ्रष्टाचार के आरोपी कुछ फेल कुछ पास। पांच निर्दलीय चमके और अपनी एक सीट बचाने में भाकपा माले सफल। लेकन सवाल वही कि झारखंड क्यों हुआ एक बार फिर खंड-खंड।

झारखंड की राजनीति में अहम बनकर उभरे खिलाड़ीः

1- दिशोम गुरू अभी भी झारखंड के सबसे बड़े गुरू
विधानसभा चुनाव परिणाम से दिशोम गुरू एक बार फिर अपने को झारखंड का सबसे बड़ा नेता साबित करने में सफल रहे हैं। कांग्रेस- भाजपा से अलग होकर लड़ने वाले झामुमो प्रमुख शिबू सोरेन ने अपना दम दिखाया है। पहली बार शिबू सोरेन ने खुली राजनीति की है। कांग्रेस से अलग होकर चुनाव लड़ने का फैसला लेना गुरू जी के लिए मामूली नहीं माना जा रहा था। लेकिन गुरुजी अकेले मोर्चे पर डटे रहे।

संथालपरगना के वे अकेले सबसे प्रभावशाली नेता हैं इसे भी साबित कर दिया है। संथालपरगना की 18 सीटों में 10 पर जीतकर शिबू ने भाजपा, कांग्रेस तथा बाबूलाल मरांडी को चुनौती पेश कर दी है। संथालपरगना से तो कांग्रेस का लगभग सफाया कर ही कर दिया। कोल्हान में भी झामुमो की ताकत बरकरार रही है।

कांग्रेस ने झाविमो को साथ लेकर दूर की कौड़ी फेंकी थी। लेकिन यह पासा उसके काम नहीं आया। कांग्रेस की नजर झामुमो, राजद को हाशिये पर लगाने की थी, लेकिन ऐसा नहीं हो सका। अब शिबू के सामने इस धार धार राजनीति को आगे बढ़ाने की चुनौती है।

सरकार बनाने के सवाल पर वह कितना झुकेंगे, कितना झुकाएंगे इसे देखा जाना है। शिबू झामुमो के सर्वमान्य नेता रहे हैं इसे उन्होंने फिर कर दिखाया है। अब सत्ता की बार्गेनिंग में कितना भारी पड़ेंगे इसे परखा जाना है।

2- राजनीति में तेजी से बढ़ रहे हैं सुदेश महतो
2000 से ही सियासत की राजनीति के केंद्र में रहने वाले आजसू के सुदेश महतो इस बार तेजी से उभरे हैं। बड़े दलों को भी चुनौती दे दी है। झारखंड की राजनीति में क्षेत्रीय दलों की भूमिका को अहम बनाने की मुहिम लेकर लगातार आगे बढ़ रही है। शिबू की तरह सुदेश ने भी अकेले लड़ने का फैसला लिया।

जिन परिस्थितियों में चुनाव की घोषणा हुई थी उसमें बड़े दलों ने गठबंधन के लिहाज से आजसू को तवज्जो देना गंवारा नहीं समझा था। और सुदेश ने भी कभी इसकी कोशिश नहीं की। दरअसल 2006 में अर्जुन मुंडा की सरकार गिरने के बाद से ही सुदेश महतो ने पार्टी को चुनाव में केंद्रित कर दिया था।

आजसू में उम्मीदवारों के नाम पहले से तय थे। जमीनी तौर पर संगठन को खड़ा करने तथा चुने हुए नेताओं को पहले ही प्रोजेक्ट कर दिया गया था। इसके बाद युवा नेता ने चुनाव लड़ने का तजुर्बा भी दिखाया।

आरोप- प्रत्यारोप से दूर रहने तथा दंभ भरने की राजनीतिक खेल से दूर रहकर अपनी राह चलकर सुदेश लंबी राजनीति करने वालों के रूप में उभरे हैं। आगे सत्ता के जोड़- तोड़ में सुदेश महतो की भूमिका परखी जाएगी।

3- अपने दम पर मजबूत होते बाबूलाल मरांडी
2006 में भाजपा छोड़ने के बाद अपनी राह चल रहे बाबूलाल मरांडी राजनीति के केंद्र में तो रहे, लेकिन विभिन्न उपचुनावों तथा लोकसभा चुनाव में मरांडी कोई छाप नहीं छोड़ सके थे।  ऐने मौके पर कांग्रेस से तालमेल का मंत्र मरांडी के काम आया। 11 सीट जीतकर क्षत्रपों के रूप में मरांडी भी मजबूत होकर ऊभरे हैं।

इसे अप्रत्याशित भी माना जा रहा है। कई सीटों पर हारकर भी जोरदार प्रदर्शन किया है। जिन सीटों पर उनके उम्मीदवार जीते हैं उनमें कई  मरांडी के प्रभाव वाले इलाके में पड़ते हैं। इसी चुनाव परिणाम के जरिये मरांडी आगे की राजनीति को धार चढ़ाएंगे।

मरांडी भी राजनीतिक हवा  की नब्ज परखने में माहिर हैं। इस बार उन्होंने भाजपा को धाव दे दिया। अब मरांडी की आगे की राजनीति परखी जाएगी। कांग्रेस के दांव- पेंच के बीच वह खुद और अपनी पार्टी को कितनी दूर तक एडजस्ट कर सकेंगे इसे देखा जाना है। गठबंधन की राजनीति में कई मोड़ पर लाभ- नुकसान का सामना करना पड़ेगा इससे वह वाकिफ भी हैं।

अब झारखंड में कैसे बनेगी सरकारः
किसी भी पार्टी को बहुमत न मिलने से झारखंड में नई सरकार कैसे बनेगी इसका लेकर आशंका के बादल मंडराने लगे है। पिछले नौ साल में पांच सरकारें, चार मुख्यमंत्री, राजनीतिक अस्थिरता का ऐसा आलम है कि निर्दलियों के ब्लैकमेलिंग से सरकारें बनती और गिरती रहीं। लगा था कि इस चुनाव में अस्थिरता और राष्ट्रपति शासन की मार झेल रही राज्य की जनता स्थायी सरकार के लिए निर्णय देगी लेकिन ये सब गलत साबित हुआ।

कांग्रेस-झाविमो सबसे बड़ा गठबंधन बनकर उभरा। भाजपा-जदयू गठबंधन दूसरे स्थान पर है। झामुमो को सर्वाधिक 18 सीटें मिलीं। आजसू भी पांच सीटें लेकर ताकतवर बनकर उभरी।

राजद सात से पांच पर सिमटा। इस पूरी खेल में झामुमो की भूमिका सर्वाधिक महत्वपूर्ण बन गई है। झारखंड विधानसभा के इस नए स्वरूप में भावी सरकार का स्वरूप क्या होगा? आइए इन संभावनाओं पर विचार करें।

पहली संभावनाः
दिशोम गुरू, सोनिया और बाबूलाल मरांडी हो एक- 
पहली संभावना बनी रही है कि कांग्रेस और झाविमो गठबंधन के साथ झामुमो मिलकर सरकार बनाए। कांग्रेस-झाविमो गठबंधन के 24 और झामुमो के 18 मिलाकर बहुमत का आंकड़ा पार कर जाता है। फिर किसी और दल के सहयोग की जरूरत नहीं पड़ेगी। लेकिन यहां सवाल मुख्यमंत्री पद का खड़ा होगा। क्या शिबू सोरेन बगैर सीएम के मानेंगे? तब बाबूलाल मरांडी क्या करेंगे? क्या वह शिबू सोरेन को मुख्यमंत्री मान लेंगे। पेंच यहीं फंसेगा। लेकिन फिर बाबूलाल बाद में चलकर नीति और सिद्धांत की बात कहकर सरकार को झटका दे सकते हैं।

दूसरी संभावनाः
भाजपा, जेएमएम और आजसू मिलकर सरकार बनाएं- भाजपा और जदयू को 20 सीटें मिली है। झामुमो के 18 और आजसू के पांच मिलाकर बहुमत का आंकड़ा(43) हो जाता है। तब शिबू सोरेन को मुख्यमंत्री के रूप में स्वीकार करना होगा। आजसू को मंत्रिमंडल में शामिल करना होगा। यह सरकार बन सकती है। कितने दिनों तक चलेगी यह कहना मुश्किल है। अब शिबू सोरेन की पार्टी भाजपा के साथ जाते हैं या नहीं, यह देखनेवाली बात होगी। वैसे राजनीति संभावनाओं का खेल है और इसमें कुछ भी संभव है।

तीसरी संभावनाः 
झामुमो और आजसू और राजद और अन्य मिलकर सरकार बनाएं-
तीसरी संभावना है कि गैर कांग्रेस और गैर भाजपा सरकार बने। झामुमो के 18, आजसू के पांच,राजद के पांच और अन्य 12 मिलकर सरकार बना सकते हैं। लेकिन इसकी संभावना क्षीण है। क्योंकि इनका आंकड़ा 41 को पार नहीं करता है। किसी तरह बन भी जाये तो स्थायित्व का सवाल खड़ा हो जायेगा।

चौथी संभावनाः
कांग्रेस-झाविमो, राजद, आजसू और अन्य मिलकर सरकार बनाएं- कांग्रेस-झाविमो गठबंधन के 24, राजद के पांच, आजसू के पांच और मात्र छह निर्दलीयों को मिलाकर बहुमत का आंकड़ा पार कर जाता है। इस स्थिति में सरकार बन सकती है। झामुमो को इसमें शामिल नहीं करने पर स्थायी सरकार की भी संभावना दिखायी देती है। लेकिन कांग्रेस को दागी नेताओं को लेना होगा

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