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बुंदेलखंड की भाग्यरेखा है गरीबी

मध्य प्रदेश के अन्दर बुंदेलखण्ड विकास प्राधिकरण है, उत्तर प्रदेश में भी बुंदेलखंड विकास प्राधिकरण है और केन्द्र भी बुंदेलखंड विकास प्राधिकरण बनाने जा रही है पर बुंदेलखंड कोई नहीं बना रहा है। सब बुंदेलखंड की बात करते हैं बुंदेलखंड राज्य के लिए सहमति भी रखते हैं। लेकिन बुंदेलखंड बनाने की प्रक्रिया में एक दूसरे का सहयोग तो दूर, बाधाएं पैदा करने में लगे हैं। बुंदेलखंड अलग राज्य की मांग कोई एक व्यक्ति विशेष और समूह विशेष का सपना नहीं, बल्कि आजादी के पहले इतिहास का एक हिस्सा है।

देश की आजादी के पहले इस भू-भाग को बुंदेलखंड सूबे के नाम से जाना जाता है। बुंदेलखंड राज्य की राजधानी नौगांव थी और इसके प्रथम मुख्यमंत्री कामता प्रसाद सक्सेना थे। 1949 में तत्कालीन गृहमंत्री सरदार पटेल के आवाहन पर बुंदेलखंड व बघेलखण्ड के 35 राजाओं ने अपनी रियासतों को भारत सरकार के अधीन इस शर्त पर सौंपा था कि इन तमाम रियासतों का एक सम्मिलित राज्य होगा, एक कार्यपालिका होगी और एक ही न्यायपालिका होगी। 35 राजाओं के हस्ताक्षर के साथ-साथ केंद्रीय गृहसचिव वपई पणगुणी मेनन ने भी हस्ताक्षर किये थे। अगर इस मसौदे को संज्ञान में लेकर विचार किया जाये तो बुंदेलखंड वासियों के साथ कितना बड़ा छलावा किया गया।

बुंदेलखंड सिर्फ संबोधन नहीं, बल्कि क्षेत्र है जो यहां के निवासियों का है। जिनका भौगोलिक स्वरूप है। जिनकी भाषा है। जिनके पास दुनिया के बेहतरीन खनिज हैं। दुनिया का सबसे बेहतरीन ग्रेनाइट, दुनिया के सुन्दर पर्यटक स्थल हैं। नहीं है तो उनका अपना अस्तित्व, अपना स्वरूप। लेकिन अगर बुंदेलखंड की कोई पहचान है तो बदहाली, बेरोजगारी, कुपोषण और बदसूरती। राज्य पुनर्गठन आयोग ने कहा कि बुंदेलखंड को अगर राज्य का दर्जा नहीं दिया गया तो निकट भविष्य में इसकी स्थिति कालाहांडी से भी बदतर हो जायेगी। हर बार राज्य बनने के तर्क को राजनैतिक इच्छाशक्ति न होने की वजह से अकाल मौत मरना पड़ा।

बुंदेलखंड के नाम पर करोड़ो की योजनाओं की जवाबदेही बुंदेलखंड वासियों के नाम होती है। पर उस योजना का मात्र 10 प्रतिशत ही 63 साल से योजनाएं परियोजनायें बढ़ती गई। लेकिन बुंदेलखंड की गरीबी खत्म होने के बजाय बड़ी और बढ़ती चली गई। बुंदेलखंड के विकास के बजाय बुंदेलखंड का विनाश हुआ है। बुंदेलखंडवासी गरीबी के अभिशाप से अपनी सारी कोशिशों के बावजूद भी अपने आपको उससे मुक्त नहीं कर पाये। बुंदेलखंड से 56 प्रतिशत लोग पलायन कर चुके हैं। खेत सूखे हैं। पेट भूखे हैं, रोजगार है नहीं, व्यापार दूर-दूर तक नहीं। 

ग्रामीण क्षेत्र में लाखों हजारों किसान ने पलायन किया देश के किसी भी हिस्से से इतनी बड़ी तादाद में लोग किसी राज्य में नहीं जाते हैं, जितना बुंदेलखंड से। पलायन का देश का औसत जो है उससे तीन गुना केवल बुंदेलखंड से दूसरे राज्यों में मजदूरी करने जाते हैं। लोग साल के आठ दस महीने बाहर रहते हैं। हर साल यह संख्या बढ़ रही है। पिछले दिनों में एक महीने में हजारों लोग हरियाणा दिल्ली राजस्थान गुजरात चले गये। पलायन की यह समस्या सरकार को कहीं परेशान नहीं करती इसका पता पल्स पोलियो के माध्यम से लगा।
सैम्पल सर्वे के अनुसार बुंदेलखंड मात्र में 68 प्रतिशत लोग गरीबी रेखा के नीचे हैं। देखा जाये तो यहां दो रेखायें हैं। महाअमीर और महागरीब बुंदेलखंड में इसके अलावा और कोई रेखा है तो वह है भाग्य रेखा।

जमीदारी उन्मूलन को लागू हुए लम्बा अरसा हुआ लेकिन आज भी बुंदेलखंड में सामन्तवादी अवशेष हैं, गांवों में बड़े कास्तकार व साहूकार दलित और आदिवासियों को नाम मात्र का कर्ज देकर बन्धुआ मजदूरी कराते हैं। यहां की एक और बड़ी समस्या सूखा है, जहां सात से अधिक नदियां हैं, वहां पानी की कीमत यह है- भवरा तोरा पानी गजब कर जाये, गगरी न फूटे खसम मर जाये। उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड हिस्से में 435 तालाब सूख चुके हैं। यहां की नदियों का पानी व्यवस्थित तरीक से दूसरे शहरों और राज्यों को पहुंचाया जा रहा है। यह उस बुंदेलखंड की बात है, जहां से केन्द्र और राज्य सरकारों को हर वर्ष लगभग 500 अरब रूपए राजस्व के रूप में मिलता है। लेकिन यहां विकास के लिये मिलने वाला बजट उत्तर प्रदेश में आने वाले बुंदेलखंड के सात जिलों को मात्र 12 करोड़ रुपये और मध्य प्रदेश के 6 जिलों को मात्र 20 करोड़ रुपये।

बुंदेलखंड के पन्ना जनपद में पाये जाने वाली हीरों की नीलामी से केन्द्र सरकार राजस्व के साथ हर साल 700 करोड़ रुपये और मध्य प्रदेश सरकार 1400 करोड़ रुपये प्राप्त कर रही है। यह पैसा इसी राज्य में लगेगा तो खुशहाली हो जायेगी। जब-जब छोटे राज्य बने वो सफल रहे। उन्होंने देश की आर्थिक व्यवस्था और प्रशासनिक ढांचे को मजबूत बनाया है। महाराष्ट्र से अलग होने पर गुजरात का विकास हमसे छिपा नहीं है। पंजाब से निकल कर हरियाणा और हिमाचल आज भारत के प्रमुख राज्यों में अपना स्थान बनाये हुए हैं। हाल में छत्तीसगढ़, उत्तराखण्ड और झारखण्ड अपने आप में छोटे राज्यों के प्रान्त अपनी निष्ठा जगाते हैं। बड़े राज्यों का विकास सम्भव नहीं।

उत्तर प्रदेश आबादी के हिसाब से दुनिया का 17 वां बड़ा देश और प्रगति के हिसाब से बीमार और पिछड़ा प्रदेश है। मध्य प्रदेश भी कहीं पीछे नहीं है। हम अब किसी तरह के तथ्य और समीक्षा का इन्तजार कर रहे हैं, जिसके चलते नये राज्यों को बनाने से आनाकानी कर रहे। दुनिया का सबसे शक्तिशाली देश अमेरिका, भारत से आबादी में दो तिहाई है, पर वो 55 राज्यों में बंटा हुआ है। इसलिए अब जरूरी है कि छोटे राज्यों की मांग पर गंभीरता से विचार किया जाए। नेता अपनी प्रतिक्रिया में पूरी गंभीरता दिखाएं ताकि इन राज्यों की मांग का कुछ असर बन सके।

इस देश में समानता तभी बनेगी जब लोगों को उनका वाजिब हक मिलेगा। मैं चाहता हूं कि इसके लिए हम सब एक साथ एक जगह बैठें। हम अपना-अपना तर्क एक दूसरे के समक्ष रखें अगर कोई भी मुङो इस विचार से कि छोटे राज्यों की आवश्यकता नहीं प्रभावित करे और समझा दे तो मैं तुरंत अपने आन्दोलन को वापस ले लूंगा। अन्यथा मेरी उन सब लोगों से यह विनय है कि इस पृथक राज्यों की समस्यायों पर सोच समझकर टिप्पिणी करें।

लेखक फिल्म अभिनेता और बुंदेलखंड मुक्ति मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं

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