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पुनर्गठन : बँटवारे की भी कोई हद होगी

बँटवारा हमारे समय का मंत्र बन गया है। ठीक वैसे ही जैसे जमीदारी के दौरान भाइयों के बीच जायदाद का बँटवारा होता था या मुगल काल में सिंहासन के लिए बाप और भाई मार दिए जाते थे। बिना सोचे समङो कि इसका अंजाम क्या होगा। नेहरू काल में प्रदेशों के बँटवारे का सिलसिला शुरू हुआ था। भाषाई राज्य बने। क्या भाषा की समस्या का समाधान हुआ?

उसका कहर सबसे अधिक हिंदी भाषियों को भुगतना पड़ रहा है। पंजाब हो या असम या महाराष्ट्र सब जगह उन पर ही कहर टूटता है। सबसे अधिक नुकसान उस प्रदेश को होता है जहाँ वह मारामारी होती है। जान का नुकसान भले ही हिंदी भाषा भाषियों का हो पर शांति वहीं की खंडित होती है, अस्थिरता वहीं बढ़ती है, माली नुकसान भी वहीं होता है। बाद में भी स्थिति वही की वही बनी रहती है।

प्रदेशों के हित छोटे हैं। उनको नुकसान पहुँचेगा तो उस हानि का असर दूर तक पहुँचेगा। किसको फायदा होगा। मिल बाँट कर खाने और जीने की मानसिकता अनावश्यक प्रतिरोध की जगह ले लेगी। इसका लाभ राजनीतिज्ञों को पहुँचेगा। बिहार का बँटवारा हुआ। नतीजा हुआ कि राजनेता एक-एक दशक के अंदर अरबपति हो गए। जनता बद से बदतर हालत में जीने के लिए बाध्य है। झारखंड माओवादियों के हिस्से में आ गया। प्राकृतिक संसाधनों से संपन्न होते हुए भी वह कमजोर भाई की तरह है, जिसे अपने अस्तित्व की लड़ाई अकेले लड़नी पड़ रही है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने प्रधानमंत्री को प्रदेश के कई हिस्सों में बँटवारे के लिए दो पत्र लिखे हैं।

एक के माध्यम से बुंदेलखंड, पश्चिमी उत्तर प्रदेश को अलग करने के लिए और दूसरा पत्र पूर्वी उत्तर प्रदेश को बाँटने के लिए लिखा। मुङो स्मरण है गोविंद बल्लभ पंत के मुख्यमंत्रित्व काल में भी राज्य पुनर्गठन आयोग ने यह सवाल उठाया था कि प्रदेश बहुत बड़ा है, इसको बाँट दिया जाना चाहिए। पंत जी मुज्जफरनगर आए थे, उन्होंने अपने भाषण में कहा था कि मुझसे कहा जाता है कि प्रदेश बहुत बड़ा है इसे छोटा कर दो। मेरी समझ में नहीं आता कि सिर काटूँ या पैर या धड़ अलग करूं? मैं मुख्यमंत्री हूँ एक पिता की तरह हूँ। मैं इस प्रदेश के टुकड़े कैसे कर दूँ।

मैं ऐसा कुछ नहीं होने दूँगा। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री करुणानिधि और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की यह घोषणा पढ़कर कि तमिलनाडु और बिहार नहीं बटेंगे मुङो उस परंपरा की याद आई जब मुख्यमंत्री अपने को प्रदेशों का रहबर समझते थे। यह ठीक है कि उस समय केंद्र और प्रदेश में एक ही पार्टी की सरकार थी। बड़े प्रदेश का लाभ केंद्र को पहुँचता था। लेकिन इस संवेदना का अभाव अब मुख्यमंत्रियों में ज्यादा है। राजनीति में सफलता संवेदना की वृहदता के बिना नहीं मिलती। लक्ष्मीबाई का यह कथन मैं अपनी झांसी नहीं दूँगी या गांधी का नारा ‘करो या मरो,’ सुभाष का यह कहना ‘तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें अजादी दूँगा’ उसी राजनीतिक संवदेना के परिचायक हैं, जिसने उनके संघर्ष को धार दी।

राजनीतिज्ञ जब बँटवारे की बात करते हैं तो उसके पीछे जनहित का आवरण मात्र होता है। तेलंगाना का जब आंदोलन हुआ था उसके पीछे एक सिद्धांत था। अब न वह सिद्धांत है, न दर्शन। अब राजनीतिक और सत्तात्मक हित हैं। एक प्रदेश की संख्या और बढ़ाकर उसकी सत्ता हथियाने की जुस्तजू है। उत्तर प्रदेश बंटा तो क्या मिलेगा? असमान संसाधन और धरती। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के पास ‘पर-कैपिटा’ आमदनी सर्वाधिक होगी। पूर्वी प्रदेश के पास धरती अधिक होगी और संभावनाएँ अधिक होंगी, बुंदेलखंड तीनों में सबसे कम साधन लेकर एक गरीब भाई की तरह अलग हो जाएगा। बुंदेलखंड के बुद्धिजीवी नहीं चाहते कि बुंदेलखंड यूपी से अलग हो। हरित प्रदेश जिसकी बात अजित सिंह करते रहे हैं जब बनेगा तो राजनीतिज्ञों के अलावा किसका भला होगा। किसी जमाने में उसे एक मुख्यमंत्री ने जाटिस्तान कहा था। कोई दलित वोटों के आधार पर इस राज्य में जमना चाहता है और कोई किसी दूसरी जाति के वोटों के सहारे। इससे जनता का क्या हित होगा?

यह ठीक है कि छोटे प्रदेश आर्थिक संपन्नता दे सकते हैं पर उसके लिए विजन और तैयारी तो हो। केवल बाँट देने से समृद्धि नहीं आती। व्यवसायी पिता अपनी संतान के बीच अपना व्यवसाय विभाजित करता है तो इस बात को ध्यान में रखता है कि सबको संसाधन बराबर मिलें जिससे वे खा-पी सकें। लेकिन राजनीति अपना हित देखती है जितने बँटवारे हुए हैं असमानता ही बढ़ी है। जितने आगे होंगे उनके बीच भी यह असमानता बनी रहेगी। क्योंकि असमानता मिटाने की न इच्छा है और न तैयारी। बस सत्ता भरा देगचा उनकी आँखों के सामने रहता है।

लेखक प्रसिद्ध साहित्यकार हैं

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