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काम का सृजन

कार्यालय में लंच के दौरान सहकर्मियों से चर्चा हो रही थी। सभी की शिकायत थी कि वे आठ घंटे पूरी निष्ठा से काम करते हैं लेकिन बॉस की शाबासी नहीं पाते। जबकि बॉस की नाराजगी थी कि वे रचनाशील नहीं हैं, और कार्यालय का काम भी वैसे ही करते हैं जैसे बर्तन धोना या झाड़ू लगाना। कहना होगा कि बॉस अधिक गलत नहीं हैं। हममें से ज्यादातर लोग काम को एक ड्यूटी की तरह करते हैं, कला की तरह नहीं। वैसे काम को कला बनाने का हुनर तो सबके पास है लेकिन उसे अंतस में हमने इतनी गहराई में दबा छोड़ा गया है कि वह होते हुए भी न होने के समान है।

हम यह भूले बैठे हैं कि बॉस ही नहीं ईश्वर भी मौलिक विचारों के साथ होता है और उसे भी रचनाशील प्रवृति के लोग अधिक पसंद होते हैं। कुछ ही दिनों पहले मेरी बात शास्त्रीय संगीत के वरिष्ठ संगीतकार पंडित जसराज से हुई। उन्होंने एक सपने की बात बताई। सपने में उनसे भगवान कृष्ण ने कहा कि जिन रागों को नए तरीके से गाते हो वह हम तक अधिक तेजी से पहुंचता है।’

रचनात्मकता और सृजनशीलता की परिभाषा को थोड़ी आध्यात्मिक छुअन दें तो पाएंगे कि हर वह काम जो प्रसन्नतापूर्वक, प्रेमपूर्वक और निस्वार्थ भाव से की जाए, इसकी परिधि में आती है। खुद के प्रति ईमानदारी इसकी प्राथमिक शर्त है। लेकिन क्या हम इन शतरें को पूरा करते हैं?

थोड़ा गहराई से सोचिए तो हममें से अधिकांश हर दिन पहले से थोड़े अधिक बेईमान और कामचोर हो जाते हैं। दरअसल हमने अपने भीतर चंचलला, आवेष, उत्तेजना, क्रोध को इतना प्रश्रय दिया है कि हमारे भीतर अशांति भर गई है और ऐसे में हमारी सृजशीलता भी खो गई है। अब इसे पाना है तो जीवन में संतुलन तो खोजना ही होगा। अरस्तू, आइंस्टाइन, शेक्सपियर, गांधी, टैगोर से लेकर वारेन बफेट तक में अगर सच्चे सृजनकार का गुण है तो वह उनका अपने कायरें के प्रति ईमानदारी के कारण। फिर उनकी निजी इच्छाएं और महत्वाकांक्षाएं भी समाप्त होकर सामूहिक हो चुकी हैं।

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