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प्रगतिशीलता के बारे में

हिंदी साहित्य की एक विशेषता है- वह प्रगतिशील है। प्रगतिशीलों का मानना है कि वह हमेशा से ही यानी कि जबसे उसका आविर्भाव हुआ है तब से प्रगतिशील है। इसका अर्थ शायद यह है कि यह भारत में ऐसा हमेशा से ही रहा है कि जनता प्रगति विरोधी है और साहित्य प्रगतिशील है। संभव है कि अकबर के जमाने में या पृथ्वीराज चौहान के राज में भी साहित्यकार दरबार में अपने किसी संपर्क के सहारे विज्ञापन लेकर प्रगतिशील लघु पत्रिका निकालते हों और लेखक संघों की बैठकें करते हों। जनता प्रगति विरोधी थी जैसा कि प्रगतिशील इतिहास से पता लगता है, देश के ब्राह्मण लगातार षडयंत्र करते थे, दूसरी जाति वाले चुपचाप षडयंत्रों का शिकार होते थे, सामंत अपने सामंतवादी मूल्यों का प्रचार प्रसार करते रहते थे।

पूंजीवाद और अंतरराष्ट्रीय उपनिवेशवाद तो इतना चतुर था कि उसकी कारगुजारियों का कोई निशान तक नहीं मिलता, तमाम प्रगतिशील ताकतों और विचारों को कुचल दिया जाता था। कुछ पतनशील, कलावादी, प्रतिक्रियावादी साहित्यकार भी रहे होंगे, जैसे कि अब हैं, इसका प्रमाण यह है कि हमारे साहित्य में रस सिद्धांत की चर्चा मिलती है। हिंदी में प्रगतिशील लेखकों ने यह संकल्प लिया हुआ था कि साहित्य से रस को बाहर कर देना है। वे अपने अभियान में सफल रहे और साहित्य से रस कम होता गया। थोड़ा बहुत बचा था उसे नागेन्द्र जी दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में रखे हुए थे। वे रिटायर होते समय उसे साथ ले गए। उसके बाद साहित्य पूरी तरह नीरस और प्रगतिशील हो गया। अब साहित्य में जो रस है वह शाम के बाद अशोक वाजपेयी के शब्दों में ‘रसरंजन’ वाला रस है और कुछ रस महिलाओं के बारे में किंचित अश्लील बातों का रस है।

ऐसा नहीं है कि प्रगतिशील और गैर प्रगतिशील साहित्यकारों में कोई सहमति के बिंदु नहीं हैं। स्वर्गीय मनोहरश्याम जोशी ने एक बार एक प्रगतिशील लेखक से कहा- ‘तुम प्रगतिशील हो और मैं नहीं हूं लेकिन मुद्दे की बात यह है कि तुम्हारा बेटा भी अमेरिका में है और मेरा बेटा भी अमेरिका में है।’ प्रगतिशील साहित्यकार का बेटा जब अमेरिका में होता है तो वह परिवार में चाचा, ताऊ, मामा, मौसी आदि को गर्व से बताता है कि उसके बेटे को डॉलर में कितनी तनख्वाह मिलती है। उसके पोते अमेरिकी एक्सेंट में अंग्रेजी बोलते हैं लेकिन प्रगतिशीलों की मंडली में बताता है कि वहां समृद्धि का प्रदर्शन कितना अश्लील है। पूंजीवाद और उपभोक्तावाद का खुला खेल देखकर मन उचट जाता है और पूंजीवाद किसी भी दिन ढह जाएगा। प्रगतिशील होना और नीरस होना अपने आप में काफी उपयोगी है।

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