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कोपेनहेगन में राष्ट्रीय हित

राष्ट्रीय संप्रभुता और अंतरराष्ट्रीय संधियों के बीच अंतर्विरोध है। संधि अनेक देशों के बीच हो तो यह अंतर्विरोध और गहरा हो जाता है। एक अर्से तक देश में विदेश नीति और अंतरराष्ट्रीय रिश्ते राजनीति का मसला नहीं बनते थे, पर अब ऐसा नहीं है। यह गलत भी नहीं, क्योंकि अपनी सरकार पर पूरा भरोसा होने के बावज़ूद जनता किसी भी बात को सही परिप्रेक्ष्य में समझना चाहती है। वक्तव्यों की शब्दावली को लेकर भी पहले की तुलना में अब कटुता ज्यादा है। ऐसा हमारी नहीं, सभी देशों की राजनीति में है।

ऐसे में हर देश को स्थानीय और अंतरराष्ट्रीय ज़रूरतों के हिसाब से अलग-अलग वक्तव्य देने पड़ते हैं। दूर से लगता है कि कोपेनहेगन में कोई ऐसा समझौता नहीं हुआ था कि उसपर कोई बड़ी बहस हो। पर जो सहमति हुई है और उससे जुड़े जो वक्तव्य आए हैं, उनकी उपेक्षा भी नहीं की जा सकती। ह्वाइट हाउस के सीनियर एडवायज़र डेविड एक्सलरॉड ने टिप्पणी की कि कोपेनहेगन समझौते के बाद भारत को अंतरराष्ट्रीय निगरानी में आना होगा। इसका क्या अर्थ लगाया जाय? कैसी है यह निगरानी? कौन करेगा? यह सब अभी तय नहीं है। 

दिशा-निर्देश अभी तय होने हैं। कोपेनहेगन समिट को विफल होने से बचाने के लिए 28 देशों के एक समूह ने सुझाव दिया है कि विकासशील देश अपने कार्यो को लेकर अंतरराष्ट्रीय सलाह और विश्लेषण को स्वीकार करेंगे। इसे कड़े शब्दों में निगरानी न भी मानें, यह भारत के घोषित लक्ष्य से अलग बात है। हमारी घोषणा है कि हम घरेलू कार्यों की अंतरराष्ट्रीय समीक्षा को स्वीकार नहीं करेंगे।

बहरहाल लगता है पर्यावरण और वनमंत्री जयराम रमेश शब्दों के प्रयोग में खो गए। उन्हें काफी देर तक सफाई देनी पड़ी कि राष्ट्रीय सम्प्रभुता के साथ समझौता नहीं होगा। देखना यह है कि कोपेनहेगन समझौते पर भारत की प्रतिबद्धता अभी सैद्धांतिक है या व्यावहारिक। अंतरराष्ट्रीय, निगरानी या अंतरराष्ट्रीय मशवरे को परिभाषित होना है। कोपेनहेगन जाने से पहले जयराम रमेश ने ससंद में कहा था कि हम पर अंतरराष्ट्रीय निगरानी थोपी नहीं जा सकेगी। अब उनका कहना है कि हमारे रुख में कुछ बदलाव आया है। उन्होंने जितने सहज भाव से यह बात कही, उतने सहज भाव से विपक्ष इसे स्वीकार नहीं करेगा। भाजपा ने इसे शर्म-अल-शेख रोग बताया है।

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