DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

मन की सेहत को समर्पित वर्ष

वर्ष 2009 की 2 जुलाई को दिल्ली हाईकोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले के अंतर्गत दो समलैंगिक व्यक्तियों द्वारा आपसी रजामंदी से शारीरिक संबंध बनाने को वैध करार दिया। इसके साथ ही कोर्ट ने यह भी कहा कि भारतीय दंड संहिता की धारा 377 भारतीय संविधान द्वारा दिए जाने वाले मूलभूत अधिकारों से मेल नहीं खाती। कोर्ट के इस ऐलान के बाद देश में समलैंगिकता के मुद्दे पर बहस तेज हो गई। अब तक यह माना जाता था कि स्त्री या पुरुषों में समलैंगिकता मानसिक विकृति के कारण होती है, लेकिन कोर्ट के फैसले के बाद समलिंगियों को अपने संबंधों को वैधानिक जामा पहनाने का अधिकार मिल गया।

ऐतिहासिक तौर पर यह सत्य है कि समलैंगिकों को घृणा की दृष्टि से देखा जा रहा था। भारत ही नहीं, बल्कि पश्चिमी जगत में भी समलिंगियों को समाज में हिकारत की नजर से देखा जा रहा है। सन 1970 से पूर्व समलैंगिकता को दिमागी विकृति ही माना जाता था। लेकिन 1973 में अमेरिकन साइकेट्रिक एसोसिएशन ने समलैंगिकता को मानसिक विकृतियों की अपनी सूची से हटा दिया था। इसके बावजूद, इस बात पर बहस आजतक जारी है कि क्या समलैंगिकों की भावनाएं अन्य लोगों से अलग होती हैं ?

मनोविश्लेषकों के अनुसार समलैंगिक अन्य लोगों से अलग नहीं होते। चूंकि यह कम संख्या में होते हैं, इसलिए समाज द्वारा लगातार हाशिए पर धकेले जाने के कारण उनमें आत्मसम्मान की कमी हो सकती है। भारत में आजतक अधिकांश समलैंगिक समाज के डर से अपना हाल बयान नहीं कर पाए हैं। मनोविश्लेषकों के अनुसार ज्यादा देर तक अपनी हालत बयान न कर पाने से भी उनके मनोविज्ञान पर विपरीत असर पड़ता है। लिहाजा, कुछ समलैंगिक जरूर अपने पहनावे में बदलाव लाते हैं। इसके बावजूद, आम जनजीवन में समलैंगिकों की भावनाएं किसी भी अन्य इनसान जैसी ही होती हैं। दिल्ली हाईकोर्ट फैसले के बाद उसके पक्ष और विपक्ष में कई आवाजें उठीं, लेकिन यह सच है कि इस ऐतिहासिक फैसले से देश में एक नई लहर देखी गई थी।

‘यूथेनेशिया
हाल में मुंबई हाईकोर्ट ने वहां के एक अस्पताल में गत 36 वर्षो से कोमा में पड़ी एक महिला के बारे में बयान जारी किया। अरुणा शानबाग नामक एक महिला, जो उसी अस्पताल में एक नर्स का काम करती थी, के साथ 1973 में उसी अस्पताल के एक पुरुष कर्मचारी ने बलात्कार का प्रयास किया था। इस हमले से अरुणा के मस्तिष्क को ऐसा आघात लगा कि वह कोमा में पहुंच गई और उसके बाद से आज तक उसी हालत में है। 36 वर्षो से लगातार उसकी देखरेख उसी अस्पताल की नर्से और डॉक्टर कर रहे हैं। यह निस्संदेह प्रशंसनीय है, लेकिन मुंबई हाईकोर्ट के इस बयान से यूथेनेशिया या इच्छा मृत्यु का विषय एक बार फिर बहस का मुद्दा बना। फर्क सिर्फ इतना है कि अरुणा के मामले में अपनी मृत्यु की इच्छा स्वयं उसने नहीं दर्शाई है।

वाईएसआर का जाना
इस वर्ष आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री वाई.एस. राजशेखर रेड्डी की विमान दुर्घटना में असामयिक मृत्यु हो जाने के बाद उसके शोक में कई लोगों का खुदकुशी करना खासा चर्चा में रहा है। हालांकि बाद में ये तथ्य सामने आया कि वाईएसआर के गम में जितने लोगों के आत्महत्या करने की बात कही जा रही है, उनमें से कई लोगों ने रेड्डी के शोक में खुदकुशी नहीं की थी। चाहे जो भी हो, पर 2009 में हुई इस घटना ने फिर से एक बार इस बहस को जन्म दिया कि क्या नेता, सेलिब्रिटी या खिलाड़ी किसी व्यक्ति के दिल से इस कदर जुड़ जाते हैं कि उनके समर्थक उनके लिए अपनी जान तक कुर्बान कर देते हैं। इस घटना के बाद मनोवैज्ञानिकों का कहना था कि अकसर देखने में आता है कि किसी व्यक्ति से खून का रिश्ता न होने पर भी हम भावनात्मक रूप से उससे इस कदर जुड़ जाते हैं कि उसके बिना जीवन अधूरा सा लगना लगता है और इसी की परिणति के तौर पर ऐसी घटनाएं देखने को मिलती है। 

सेना के लिए मेंटल हेल्थ प्रोग्राम
इस वर्ष जुलाई, 2009 में रक्षा मंत्री ए.के. एंटनी ने सेना में दिन-ब-दिन आत्महत्या के बढ़ रहे मामलों से निपटने के लिए मेंटल हेल्थ स्कीम लांच करने की बात कही। संसद की स्थाई समिति ने अपनी 30 और 31 वीं रिपोर्ट में आम्र्ड फोर्सेस में तनाव बढ़ने की बात कही थी। एंटनी ने 13 जुलाई को संसद में जानकारी दी थी कि सेना में 2006 से अब तक 520 मामले खुदकुशी के हुए हैं, जिसमें से 495 सिर्फ आत्महत्या के है। एंटनी ने यह भी जानकारी दी कि 70 प्रतिशत आत्महत्या शांतिपूर्ण स्टेशनों पर हुई तो शेष फील्ड एरिया में।

‘पा’ से प्रोजेरिया
हाल में रिलीज फिल्म ‘पा’ में अमिताभ बच्चन ने प्रोजेरिया से पीड़ित एक तेरह वर्षीय बालक ऑरो की भूमिका में खासी प्रशंसा बटोरी। इसके बाद प्रोजेरिया नामक बीमारी के प्रति आमजन में खासा कौतुहल देखा गया। प्रोजेरिया एक ऐसी बीमारी है जिसमें इससे पीड़ित बच्चे की आयु तेजी से बढ़ती है। एक शोध के अनुसार डॉक्टरों ने कहा है कि मौजूदा समय में पूरी दुनिया में प्रोजेरिया के पचास से कुछ ऊपर मामले हैं। साथ ही यह भी कहा गया है कि सभी वर्णो और नस्लों में यह मामले देखने को मिले हैं। इस कारण भी यह बीमारी बेहद हैरान करती है। आमतौर पर प्रोजेरिया से पीड़ित बच्चे की आयु 8 से 21 वर्ष तक ही होती है, लेकिन औसतन यह 13 वर्ष तक जीवित रहता है। देखने में भी इससे पीड़ित बच्चे काफी हद तक एक से दिखते हैं। अधिकांश पीड़ितों की हृदय रोग से ही मौत होती है।

प्रोजेरिया से पीड़ित नब्बे प्रतिशत बच्चों में लेमिन ए नामक प्रोटीन के सेल को संभालकर रखने वाली जीन में बदलाव के कारण होता है। ऐसा माना जाता है कि खराब लेमिन ए न्यूक्लियस को अस्थिर करता है। इसी कारण देखने में प्रोजेरिया से पीड़ित बच्चे उम्र से कहीं अधिक दिखते हैं। विशेषज्ञ यह भी नहीं मानते कि प्रोजेरिया आनुवांशिक होता है। उनके अनुसार जीन में यह बदलाव संयोगवश ही होता है।

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:मन की सेहत को समर्पित वर्ष