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मनोचिकित्सा साल का हाल

एक और साल बीत गया, लेकिन केंद्र सरकार बढ़ते मानसिक रोगों से निपटने के लिए कोई कारगर रणनीति पेश नहीं कर पाई। डाक्टरों की कमी से निपटने तथा मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं का जिला स्तर तक विस्तार करने की दिशा में ठोस पहल नहीं हुई जबकि वर्ष प्रतिवर्ष जीवनशैली में बदलाव के कारण मानसिक रोगियों की संख्या में इजाफा होता जा रहा है।

स्वास्थ्य महकमे के आंकड़ों के अनुसार करीब 7 फीसदी आबादी यानी करीब आठ करोड़ लोग मानसिक रोगों की चपेट में हैं। इनमें से दो फीसदी गंभीर रूप से बीमारियों से ग्रस्त हैं, लेकिन चिकित्सकों की संख्या घटती जा रही है। मनोचिकित्सकों का विदेशों को हो रहा पलायन थमा नहीं है तथा देश में सिर्फ तीन हजार मानसिक रोग विशेषज्ञ उपलब्ध हैं जबकि रोगियों की संख्या को देखते हुए कम से कम 12 हजार विशेषज्ञ चिकित्सकों की जरूरत है।

डाक्टरों की कमी के चलते 1982 में शुरू किया गया राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम सिर्फ 123 जिलों में ही पहुंच पाया है। मानसिक रोगियों के लिए सरकार की जेब भी खाली है। दसवीं योजना में सात करोड़ रोगियों के नाम पर 139 करोड़ जारी किए गए, लेकिन इसमें भी हैल्थ मिनिस्ट्री 106 करोड़ ही खर्च कर पाई। 11वीं योजना में बजट हजार करोड़ हुआ लेकिन डाक्टरों के अभाव में सरकार ने हथियार डाल रखे हैं। अलबत्ता अब एमबीबीएस डाक्टरों को ट्रेनिंग देकर उन्हें मानसिक रोगों के उपचार के लिए ट्रेंड किया जा रहा है।

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