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नए जीन की खोज

वर्ष 2009 की अहम उपलब्धियों में से एक है इंडियन इंस्टीटय़ूट ऑफ साइंस (आईआईएस) के वैज्ञानिकों द्वारा मस्तिष्क के एक मुख्य विकार माइक्रोसैफेली को पनपाने वाले जीन की खोज। आईआईएस के वैज्ञानिकों को इस शोध में नेशनल इंस्टीटय़ूट ऑन मेंटल हेल्थ एंड न्यूरोसाइंसेज- निमहंस का खासा सहयोग मिला।

भारत में इस प्रकार के रोगियों की संख्या अन्य देशों की अपेक्षा काफी अधिक है। इससे पहले इस रोग से जुड़े चार और जीनों की खोज की जा चुकी है। इससे पहले खोजे गए ये चारों जीन एक से दूसरी पीढ़ी में संक्रमण कर आए थे। पर वैज्ञानिकों के अनुसार एसटीआईएल नामक यह जीन ही माइक्रोसैफेली के जन्म का प्रमुख कारक है। इस खोज का सीधा लाभ यह हुआ है कि गर्भ की आरंभिक अवस्था में ही अब इस विकार की पहचान की जा सकेगी। इस विकार से ग्रसित 85 प्रतिशत भारतीयों को आज भी सही उपचार की सुविधा नहीं मिल पाती थी, पर इस खोज के बाद यह उम्मीद जागी है कि उन्हें अब सहज और कम कीमत पर सही वक्त पर उपचार उपलब्ध हो जाएगा।

क्या है माइक्रोसैफेली
माइक्रोसैफेली मस्तिष्क का एक ऐसा विकार है जिसमें मस्तिष्क का आकार सिकुड़ने लगता है, जिस वजह से व्यक्ति की बौद्धिक और मानसिक क्षमताओं का विकास रुक जाता है। आमतौर पर एक स्वस्थ्य आदमी के मस्तिष्क का वजन 1,459 ग्राम होता है,जबकि माइक्रोसैफेली से ग्रसित रोगी के मस्तिष्क का भार 430 ग्राम तक पहुंच जाता है। इस अर्थ में इस जीन की खोज एक क्रांतिकारी उपलब्धि है। अब न सिर्फ भ्रूणावस्था में इस विकार की सुनिश्चित तौर पर पहचान हो जाएगी बल्कि अन्य विकारों की पहचान में सहायक सिद्ध होगी।

नए ब्रेन प्रोटीन की खोज
इस वर्ष अमेरिका के नार्थ कैरोलिना विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने एसआरजीएपी2 नामक ब्रेन प्रोटीन की खोज कर मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में अहम उपलब्धि हासिल की है। इस प्रोटीन का मस्तिष्क के विकास में अहम स्थान है। पागलपन, डाएलेक्सिया जैसे रोगों की रोकथाम में यह खोज एक मील का पत्थर है।

पहला अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन
मंदी ने पूरी दुनिया को खासा नुकसान पहुंचाया है पर वर्ष 2009 इस बात का गवाह रहेगा कि इसी मंदी के कारण विश्वभर में मानसिक स्वास्थ्य को लेकर संवेदनशीलता बढ़ी। पहली बार ग्रीस की राजधानी एथेंस में 2-6 सिंतबर को मानसिक स्वास्थ्य पर अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन हुआ। इस सम्मेलन की आयोजक थी वर्ल्ड फेडेरेशन ऑफ बाइनीयल कांग्रेस।

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