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ब्लॉग वार्ता : छोटे राज्य, छोटे सपने

कल को इनको लगने लगेगा कि देश बहुत बड़ा है, इस पर शासन करना मुश्किल हो रहा है तो क्या इसके भी टुकडे किए जायेंगे? अगर नेताओं में क्षमता नहीं है तो निवेदन है कि आप लोग इन बंटवारों में फंसने के बजाय कुर्सी ही छोड़ दें जिससे देश इस तरह की समस्याओं से बचा रह सके। वरना कहीं ऐसा न हो कि अगले चुनाव में जनता आप लोगों को कहीं का न छोड़े। इस तरह के सवालों से हिंदी ब्लॉग जगत में बहस गरम है।
उत्तर प्रदेश के लहरपुर के डॉ. आशुतोष शुक्ल अपने ब्लॉग सीधी खरी बात में नेताओं की क्षमता पर सवाल उठाते हैं।

http://seedhikharibaat.blogspot.com क्लिक करते ही आशुतोष का गुस्सा नजर आता है। कहते हैं कि किसी नेता की अक्षमता की सजा पूरे प्रदेश को कैसे दी जा सकती है? आज के नेता केवल राजधानियों में बैठकर ही शासन करना चाहते हैं। इसी तरह के सवाल रचना भी उठा रही हैं।     

http://indianwomanhasarrived.blogspot.com क्लिक करते ही नारी ब्लॉग राज्यों के विभाजन के विरोध का झंडा बुलंद किए हुए हैं। रचना कहती हैं कि जितने एकजुट होकर हम बंटवारे के लिए आन्दोलन करते हैं, कभी विकास के लिए करते हैं, शायद नहीं, क्यों? क्योंकि ये आन्दोलन करके वे नेता बनने जा रहे हैं, कल को सीएम भी बन जाएंगे, लेकिन वह लोग वही रहेंगे जो आज यूपी में है और कल बुंदेलखंड या पूर्वाचल में रहेंगे।

इन बहसों से साफ होता है कि राजनेताओं के चरित्र को लेकर किसी ब्लॉगर के मन में कोई शंका नहीं है। रचना लिखती हैं कि कभी जो काम अंग्रेजों ने किया था वही अब हम अपने देश में करने जा रहे हैं। एक दिन  वह भी आएगा कि ये तथाकथित नेता अपने स्वार्थ के लिए चार राज्यों को मिला कर अलग राष्ट्र की मांग करेंगे।

नव्यदृष्टि ब्लॉग पर डॉ. राधेश्याम शुक्ल आंध्रप्रदेश और तेलंगाना के मिलन और बंटवारे को नई नजर से देखते हैं। http://navyadrishti.blogspot.comक्लिक करते ही डॉ. शुक्ल की इस दलील पर नजर पड़ती है। कहते हैं कि केंद्र सरकार ने उस तेलंगाना के लोगों की सहमति के बिना इस क्षेत्र को आंध्र प्रदेश में मिला दिया था। आज करीब पचपन वषों बाद उसने फिर बिना किसी से पूछे इस प्रदेश को आंध्र प्रदेश से अलग करने का निर्णय लिया है। यह बात अलग है कि इस तरह केंद्र सरकार ने मात्र अपनी  गलती सुधारी है।

राधेश्याम शुक्ल इतिहास की जानकारी दे रहे हैं। कहते हैं कि आजादी के बाद जब मद्रास प्रांत का विभाजन हुआ तभी से आंध्र प्रदेश के ताकतवर नेताओं की नजर तेलंगाना और निजाम की राजधानी हैदराबाद व उसकी संपत्ति पर लगी हुई थी।  आज भी मूल झगड़ा हैदराबाद को लेकर है। तेलंगाना के विरोधी नेता कहते हैं कि उनकी हैदराबाद में जो संपत्तियां हैं, जो वहां निवेश किया गया है, उसे कैसे छोड़ सकते हैं। डॉ. शुक्ल बताते हैं कि विलय के समय भी तेलंगाना का राजस्व आंध्र के राजस्व से अधिक था। तेलंगाना की खनिज व जल संपदा आंध्र के विकास के काम आई। फिर आज यदि तेलंगाना के वंचित लोगों के हित में फैसला उलटा जा रहा है तो इससे उनका दर्द इतना क्यों बढ़ गया है।

डॉ. शुक्ल उन ब्लॉगरों में से हैं जो तेलंगाना बनने के पक्ष में खड़े दिखाई देते हैं। ज्यादातर इस आशंका से भी परेशान हैं कि तेलंगाना की आग में जल कर कई बड़े राज्य छोटे हो जाएंगे। मेरी नजर एक ब्लॉग पर पड़ती है। नाम है- बात बोलेगी हम नहीं। http://batbolegihamnahin.blogspot.com पर  अमलेंदु उपाध्याय कहते हैं कि तथ्यों के हिसाब से छोटे राज्यों में विकास दर बड़े राज्यों की तुलना में कई गुना अधिक है। उदाहरण देते हुए बताते हैं कि बिहार की प्रति व्यक्ति आय चार हजार रुपये से भी कम है। जबकि हिमाचल जैसे छोटे प्रदेश में यही 18,750 रु है ।

लेकिन अमलेंदु इन तर्कों के छोटे राज्यों के हक में पेश किये जाने के खिलाफ हैं। सवाल उठा रहे हैं कि अच्छे प्रशासन के लिए छोटे राज्य ठीक हो सकते हैं लेकिन ये ही विकास की एकमात्र गारंटी कैसे हो सकते हैं? दिल्ली के प्रथम मुख्यमंत्री चौधरी ब्रह्मा सिंह ने दिल्ली, हरियाणा, पश्चिम उत्तर प्रदेश और राजस्थान के कुछ हिस्सों को मिला कर वृहत्तर दिल्ली की मांग की थी, लेकिन पंडित गोबिन्द वल्लभ पंत ने इस मांग को इस तरह से दबा दिया कि अब इसका वजूद नहीं मिलता है। नेताओं की खराब साख और छोटे व नए राज्यों के खराब प्रदर्शन ने तेलंगाना से लेकर बुंदेलखंड की मांग को बेमानी बना दिया है। ब्लॉग जगत की आम जनता की यही राय है।

 ravish@ndtv.com

लेखक का ब्लॉग है naisadak.blogspot.com

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