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वास्तविक समृद्धि

आर्थिक रूप से देखें तो हमे दो तरह के लोग दिखाई देते हैं। एक धनी या समृद्ध तथा दूसरे निर्धन अथवा अभावग्रस्त। क्या समृद्धि के आकलन का आधार मात्र पूंजी-धंधे, प्रति व्यक्ति आय अथवा उपभोग के स्तर अथवा सेवाओं की स्थिति को माना जा सकता है? किसी भी व्यक्ति अथवा राष्ट्र की समृद्धि के सही मूल्यांकन के लिए अन्य महत्वपूर्ण तत्वों की भी उपेक्षा नहीं की जा सकती।
    
लेकिन पैसे के अतिरिक्त भी अन्य कई तत्व हैं जो हमारी समृद्धि के परिचायक और नियामक हैं। इसमें सबसे पहले आता है हमारा भौतिक शरीर। हमारे शरीर के स्वस्थ और पूर्ण अंग-प्रत्यंग। एक व्यक्ति भीख मांग कर जीवन निर्वाह करता था। पास से गुजरने वाले एक व्यक्ति ने उससे कहा कि तुम धनवान होते हुए भी क्यों भीख मांगते हो। ‘मैं बहुत गरीब हूं’, भिखारी ने कहा। उस व्यक्ति ने भिखारी से कहा कि तुम ऐसा करो कि अपनी दोनों आंखें मुझे दे दो। उसके बदले में मैं तुम्हें लाखों रुपए दे दूंगा। भिखारी ने कहा कि ये कैसे हो सकता है कि तुम्हें पैसों के बदले अपनी आंखें दे दूं। तो फिर कोई दूसरा अंग ही मुङो दे दो जिसके बदले मैं तुम्हें मुंहमांगी कीमत दे दूंगा। लेकिन भिखारी कैसे मान लेता? उस सज्जन ने कहा कि जब तुम्हारे शरीर के अंग-प्रत्यंग इतने कीमती हैं तो फिर तुम गरीब कैसे हुए।
    
वास्तव में हमारा शरीर सबसे कीमती वस्तु है। दुर्लभ वस्तु है मनुष्य का शरीर। मनुष्य रूप में जन्म लेना ही सबसे बड़ी समृद्धि है। और यदि ये मानव देह रोगों से मुक्त है तो यह भी एक समृद्धि ही तो है। निरोगी काया तो सबसे बड़ा सुख माना गया है। एक धनी व्यक्ति जो अपनी बीमारी के कारण अनेक प्रकार के खाद्य पदार्थो का सेवन कर ही नहीं सकता उससे तो रूखा-सूखा भोजन खाकर मस्त रहने वाला व्यक्ति ही अधिक समृद्ध है क्योंकि वह स्वस्थ है।

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