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टैक्स के महीने

जब वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी ने अपने बजट में फ्रिंज बेनिफिट टैक्स (एफबीटी) खत्म करने की घोषणा की थी तो उसका व्यापक स्वागत हुआ था, क्योंकि उसे खत्म करने की मांग लगातार आ रही थी। एफबीटी खत्म करने के कई फायदे हैं लेकिन एक नुकसान कुछ लोगों को झेलना पड़ेगा। जिन लोगों को अपनी कंपनियों से कुछ बड़ी सुविधाएं जैसे मकान, कार, ड्राइवर, माली वगैरा मिलती हैं, उन्हें उन सुविधाओं पर टैक्स देना पड़ेगा। कठिन यही है कि सारे साल भर का टैक्स आखिरी चार महीनों में कटेगा।

इसकी वजह यह है कि बजट चुनाव की वजह से देर से आया, उसके बाद सरकार ने इस टैक्स की दरों वगैरा के बारे में अधिसूचना जारी करने में पांच महीने लगा दिए। यह टैक्स इस पूरे साल का देना होगा और इस वित्तीय वर्ष के चार महीने बचे हैं सो सारा टैक्स अभी कटेगा। इस टैक्स में बुनियादी तौर पर गलत कुछ नहीं है, जो लोग अपनी कंपनियों से गैर नकदी सुविधाएं जैसे मकान, कार वगैरा पाते हैं उन्हें टैक्स तो देना चाहिए। जब एफबीटी लागू नहीं हुआ था तब भी ऐसा टैक्स देना होता था, उसकी दरों में फर्क होता था।

असली दिक्कत यह है कि साल भर का टैक्स अब कटेगा और जिनको यह टैक्स देना है उन्हें अब पता लगा है कि उन्हें टैक्स देना है और कितना देना है। यह टैक्स टीडीएस के रूप में कटेगा यानी तनख्वाह में ही इतनी कटौती होगी, शायद लोग इसके लिए तैयार नहीं होंगे और इससे उनका बजट गड़बड़ा जाएगा। वर्षात की छुट्टियां भी लोग मनाते हैं, अक्सर आखिरी महीनों में इन्कम टैक्स भी ज्यादा कटता है, जीवन बीमा वगैरा का ढेर सारा प्रीमियम भी इन्हीं महीनों में होता है।

शिक्षण संस्थाओं में भरती, फीस वगैरा के भी ये ही महीने होते हैं, ऐसे में अचानक कुछ ज्यादा कटौती हो जाए तो लोगों को दिक्कत होगी। अगर सरकार अपना कामकाज अपनी ही गति से न करे, लोगों की सुविधाओं का भी ख्याल रखे, तो लोगों को अच्छा लगेगा और सरकार पर उनका भरोसा बढ़ेगा। बजट की एक घोषणा की अधिसूचना जारी करने में पांच महीने क्यों लगने चाहिए? क्या यह जल्दी नहीं हो सकता था? इससे प्रभावित होने वाले लोग बहुत नहीं होंगे लेकिन इससे सरकारी कामकाज का तरीका तो समझ में आता ही है। सरकार का काम टैक्स वसूलना तो है ही लेकिन अगर जोर का धक्का जरा धीरे से लगे तो क्या बुरा है?

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