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विवाद निपटाने दारूलकजा नहीं कोर्ट जा रहे मुस्लिम

ऑल इंडिया मुस्लिम पसर्नल लॉ बोर्ड मुस्लिम परिवारों में झगड़ों के निपटारे के लिए शरई अदालतों (दारूलकजा) के बजाए सामान्य अदालतों के प्रति बढ़ते रुझान से फिक्रमंद है।

बोर्ड इस कोशिश में है कि मुस्लिमों के पारिवारिक झगड़े शरियत के प्रावधानों के तहत दारूलकजा में ही निपटाए जाएँ। लखनऊ में हाल में हुई बोर्ड की कार्यकारिणी बैठक में इस मुद्दे पर भी विचार हुआ और तय किया गया कि बोर्ड की दारूलकजा कमेटी के संयोजक मौलाना सलमान नदवी पूरे देश में इस बाबत अभियान चलाएँगे। 

बकौल पर्सनल लॉ बोर्ड कार्यकारिणी के प्रमुख सदस्य डा.कासिम रसूल इलियास-इसके लिए काजियों को प्रशिक्षित किए जाने पर भी जोर दिया जाएगा। बोर्ड ऐसे प्रशिक्षण केन्द्रों की तादाद भी बढ़ाएगा।

हालांकि महिला काजी तैयार करने के बजाए यह कोशिश की जा रही है कि बोर्ड की जो महिला सदस्य हैं वह बतौर काउंसलर मुस्लिम औरतों के बीच काम करें। हालांकि डा. इलियास मानते हैं कि पारिवारिक झगड़ों के मामलों में महिला अपनी बात किसी महिला के सामने अच्छी तरह से खुलकर कह सकती है।

आँकड़ों की पड़ताल से पता चलता है कि अकेले लखनऊ की पारिवारिक अदालत में लम्बित करीब पन्द्रह हजार मुकदमों में एक तिहाई मुस्लिम परिवारों के हैं। इनमें तलाक, दहेज उत्पीड़न और घरेलु हिंसा के मामले अहम् हैं। प्रदेश की बाकी पारिवारिक अदालतों में भी ऐसे मामलों के आँकड़े कमोवेश यही हैं।

मामलों की बढ़ती तादाद और इनके निपटारे के लिए दारूलकजा की बजाए सामान्य अदालतों में जाने की बढ़ती प्रवृत्ति के अलावा बोर्ड नेतृत्व इस पर भी परेशान है कि तमाम राज्यों में जिला स्तर पर दारूकजा का गठन अब तक नहीं हो सका है। यही वजह है कि मजबूरन मुस्लिमों को फैमिली कोर्ट और ऐसी ही अन्य अदालतों की शरण में जाना पड़ता है।

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