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धरोहर के खरीदार

इस बात पर खुशी व्यक्त की जा रही है कि उद्योगपति विजय माल्या ने गांधी जी की व्यक्ितगत इस्तेमाल की चीजें नीलामी में खरीद कर उन्हें भारत के अलावा किसी और देश जाने से बचा लिया। भारत सरकार का कहना है विजय माल्या दरअसल भारत सरकार के लिए ही नीलामी में हिस्सा ले रहे थे। इस पूरी घटना से यह समझ में आता है कि हमें गांधी जी के चश्मे से तो लगाव है, लेकिन उनकी दृष्टि से नहीं। ऐसा नहीं कि विजय माल्या की देशभक्ित पर कोई संदेह है। वे भारत में पूरी तरह कानूनन और सामाजिक स्तर पर स्वीकृत कई उद्योग चलाते हैं और वे टीपू सुल्तान की तलवार भी एक नीलामी में खरीद कर भारत लाए थे। विचित्र सिर्फ यह है कि विजय माल्या अनेक चीजों में उन बातों के विलोम हैं, जिनके लिए गांधी जी जाने जाते थे। गांधी जी शराब के कट्टर विरोधी हैं, माल्या की सारी समृद्धि शराब के व्यापार से आई है। गांधी जी हद दज्रे तक सादगीपसंद थे, माल्या अपनी दौलत का बेतहाशा प्रदर्शन करते हैं। गांधी जी का सारा जीवन दूसरों के लिए त्याग करने का उदाहरण है, माल्या ने धन परोपकर के लिए तो नहीं बटोरा है। माल्या के एकाध सूट या अंगूठी की कीमत में गांधी जी का सालों का निजी खर्च चल जाता। इसलिए यह विरोधाभासी लगता है कि गांधी जी की चीजें प्राप्त करने के लिए सरकार को माल्या की मदद लेनी पड़ी। विरोधाभास तो यह भी है कि गांधी जी की व्यक्ितगत चीजों को लेकर इतनी हायतौबा मचाई जाए। गांधी जी खुद भी इस तरह की व्यक्ितपूजा पसंद न करते, बल्कि वे तो यही चाहते कि उनकी चीजों की बजाए उन मूल्यों की रक्षा की जाए, जो उन्हें प्रिय थे। लेकिन जब गांधी जी के एक बड़े मूल्य, साधन की पवित्रता को त्याग दिया जाए तो फिर गांधी जी के चश्मे और किसी भारतीय राजघराने के कीमती आभूषण में कोई फर्क नहीं रह जाता, जो सिर्फ हमार अतीत का प्रतीक या ‘एंटीक’ है। पिछले सालों में हुआ यही है कि हमार सत्ता-शक्ितसम्पन्न वर्ग ने गांधी जी को आम हिन्दुस्तानी से छीन लिया है। उन्हें सिर्फ ऐतिहासिक स्मारक बना दिया गया है, जिन पर सरकारी उत्सवों पर फूल चढ़ा दिए जाते हैं। नीलामी के समूचे प्रकरण में हमारा आचरण यही बताता है कि हम गांधी जी से कितनी दूर हो गए हैं।

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