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'ग्रासमैन' ने कंद-मूल खाकर बीमारियों से पार पाया

मुजफ्फरनगर का सतबीर नाम का एक किसान पिछले पांच सालों से अन्न व जल को पूरी तरह त्यागकर केवल नीम के पत्ते, कंदमूल, दूध व जंगली घास खाकर जीवन बिता रहा है।

सतबीर (65 वर्ष) ने यह सब जान बूझकर अपनी आदतों में शुमार किया। उसका कहना है कि कई घातक बीमारियों को उसने अपने इस फार्मूले से ठीक कर दिया।

मुजफ्फरनगर जनपद के देहरादून-दिल्ली राजमार्ग पर स्थित गांव बंढडी निवासी सतबीर सिंह उर्फ सतभुत्ती स्वस्थ्य दिखाई देते हैं। उनके शरीर में अब भी काफी चुस्ती फुर्ती है।

सतबीर पिछले कई सालों से विभिन्न घातक बीमारियों जैसे ब्लड प्रेशर, हृदय रोग व गुर्दो के संक्रमण से पीड़ित थे। वह ठीक से चल भी नहीं पाते थे। दवाओं से उनके शरीर में खुश्की हो गई। बीमारियों से परेशान किसान ने कहीं किसी पुस्तक में यह पढ़ लिया कि अनाज के खाने से शरीर में विकार आ जाते हैं। रोटी शरीर को पौष्टिकता तो देती है लेकिन साथ ही आहार को पचाने के लिए काफी ऊर्जा भी खर्च करनी पड़ती है, इससे शरीर में शिथिलता पैदा हो जाती है।

इसके बाद उन्होंने अन्न के साथ जल त्याग दिया और जंगली घास, कंदमूल व नीम के पत्ते खाने शुरू कर दिए। पानी के स्थान पर गाय का दूध लेने लगे।

सतबीर ने पिछले दो वर्षो से पानी नहीं पिया। शरीर में पानी की पूर्ति के लिए वह सुबह-शाम गाय का दूध पीते हैं। खाने में 25 से 5० ग्राम नीम के पत्तों के अतिरिक्त पीपल के पत्ते और बेलपत्र लेते हैं। दिन में जब भी भूख महसूस होती है तो पत्तों को चबा कर भूख शांत कर लेते हैं। खान पान में बदलाव से वह निरोग हो गए।

गांववालों ने उन्हें 'ग्रासमैन' नाम दिया है। गांव के सैकड़ों लोग भी अब उनकी तरह जीवन जीने का प्रयास कर रहे हैं। ग्रामीण तेजपाल का कहना है कि खाने पीने के सामानों में इतनी मिलावट को देखते हुए पेड़ों के पत्ते और गाय का दूध तो उनसे बेहतर ही है।

सतबीर सिंह के परिवार के अन्य लोग सामान्य भोजन ही करते हैं। जब घरों में त्यौहारों पर पकवान व मिठाई बनती है तब भी सतबीर सिंह केवल पत्तों व दूध की मांग करते हैं।

चिकित्सक नरेन्द्र कुमार ने आहार के इस तरीके को चुनौतीपूर्ण और चिकित्सा विज्ञान की दृष्टि से हानिकारक बताया। उन्होंने कहा कि शरीर को हर तरह का पौष्टिक तत्व समय-समय पर मिलना चाहिए।

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