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भाषा से आगे बढ़कर सोचने का समय

ब्रिटिश साम्राज्य से मुक्ति के साथ ही देश में विकास की नई यात्रा शुरू हुई थी। छोटी-बड़ी लगभग 400 रियासतों का भारत में तथा कुछ का पाकिस्तान में विलय हुआ था, वहीं भूटान और हैदराबाद ने अपने को स्वतंत्र घोषित किया था। सरदार पटेल की कुशल रणनीति और सैन्य कार्यवाही के बाद हैदराबाद का भारत में विलय हो पाया था। आजादी के साथ-साथ विभाजन का दर्द भी हमको सहना पड़ा था इसलिए न चाहते हुए भी कई गंभीर मुद्दे गौण हो गए थे। अंग्रेजों की कुटिल चाल व कुछ नेताओं की महत्वाकांक्षाओं के परिणाम स्वरूप देश का मजहब के आधार पर बंटवारा हो गया था और यहीं से एक रेखा अपने और पराए की नीचे तक चल पड़ी थी। जिसमें मेरी भाषा, मेरा क्षेत्र, मेरी संस्कृति, मेरी पहचान के बीज अंकुरित होने लगे।

1953 में जब भाषाई आधार पर राज्यों की मांग उठी तो राज्य पुनर्गठन आयोग बनाया गया। आयोग ने भी माना था कि अगर भाषाई आधार पर राज्यों का विभाजन कर दिया जाए तो लोगों को एकजुट रखा जा सकता है। शायद इससे मजहबी खाई को कुछ कम किया जा सकता है। भाषा को आधार मानते हुए आयोग ने संस्तुति की थी कि अल्पसंख्यकों के अधिकार के लिए संवैधानिक मान्यता दी जानी चाहिए, जिससे प्राथमिक शिक्षा अपनी मातृ भाषा में दी जा सके।

भाषा के आधार पर ही मद्रास के तमिल भाषी 16 क्षेत्र आंध्र प्रदेश में सम्मिलित हुए थे। 1953 से लेकर 1960 तक विभिन्न राज्यों की सीमाओं में बदलाव हुआ और उसका आधार बिंदु भाषा बनी। 1 नवम्बर 1956 को जो राज्य बने उसमें आंध्र प्रदेश था जिसमें तेलंगाना क्षेत्र और हैदराबाद राज्य मिला। असम, बिहार, बम्बई जिसमें सौराष्ट्र और कच्छ तथा मराठी भाषी जिला नागपुर जो कि मध्य प्रदेश का हिस्सा तथा मराठवाड़ा जो कि हैदराबाद का हिस्सा हुआ करता था इसको मिलाकर बम्बई बना और बम्बई के अधिकांशत: दक्षिणी हिस्से मैसूर राज्य में शामिल किए गए।

वर्ष 1960 में बम्बई महाराष्ट्र और गुजरात के रूप में नया राज्य बना। मध्य भारत, विन्ध्य प्रदेश और भोपाल को मिलाकर मध्य प्रदेश राज्य बना। वहीं वर्ष 1969 में मद्रास राज्य से मालाबार को अलग करके केरल राज्य बना। और कन्याकुमारी जिले को जोड़कर मद्रास का नाम तमिलनाडु रखा गया। यह जोड़ तोड़ जारी रहा। पहले 14 राज्य बने जो बाद में बढ़कर 28 हो गए।  केन्द्र शासित प्रदेशों की तस्वीर भी बदल गई। भाषा की भूमिका अब गौण हो गई है अब विकास और स्थानीय नेतृत्व भावना नए राज्य निर्माण की भूख लोगों में पैदा कर रही है।

छोटे राज्य विकास के पथ पर तेजी से आगे बढ़े हैं यह भावना लोगों के मन मस्तिष्क पर हावी हो रही है। राज्य पुनर्गठन आयोग ने भी छोटे राज्यों की वकालत करते हुए उत्तर प्रदेश तथा बिहार के बंटवारे की बात कही थी। उसने बिहार में झारखंड को अलग करने तथा उत्तर प्रदेश के विकासके लिए दीर्घकालिक योजना पर कार्य करने की आवश्यकता जताई भी, जिसमें इसका बंटवारा भी शामिल था। किन्तु उक्त समय के नेतृत्व ने इसको नकार दिया था।

छोटे राज्यों ने अपने मातृ राज्य की अपेक्षा ज्यादा तेजी से विकास किया है चाहे पंजाब से अलग हुआ हरियाणा, हिमाचल व मुम्बई से अलग गुजरात राज्य हो। कुछ ही समय पहले बने झारखंड, उत्तराखंड व छत्तीसगढ़ ने त्वरित विकास में अपनी नई गाथा लिखी है। भारतीय जनता पार्टी शुरू से ही छोटे राज्य की पक्षधर रही है और मानती है कि इससे जहां प्रशासनिक पहुंच आसानी से आम जनता तक होती है वहीं विकास में जनता की भागीदारी भी सुनिश्चित रहती है। कानून व्यवस्था की स्थिति सुदृढ़ रहती है। अन्यथा अशिक्षा, असमानता, गरीबी को लेकर आक्रोश पैदा होता है, उससे आक्रोश व आतंकवाद पनपता है। नक्सलवाद और अपराध बढ़ना इसी की परणति है।

भौगोलिक दृष्टि से तथा जनसंख्या के आधार पर उत्तर प्रदेश सर्वाधिक उपेक्षित रहा है। पूर्वाचल की गरीबी को लेकर पटेल आयोग बनाया गया था उसने वहां की गरीबी का मार्मिक चित्रण पेश किया था। विश्वनाथ गहमरी संसद में ही रो पड़े थे। पूर्वाचल में जहां जोत कम है वहीं बुंदेलखंड सूखे के कारण और अपनी भौगोलिक स्थिति से पिछड़ गया है। यहां का किसान कर्ज और मर्ज से आत्महत्या करने को विवश है। यहां की गरीबी का फायदा उठाकर पूर्वाचल में माफिया, नौजवान अपराधियों की प्रमुख फसल पैदा कर रहा है तथा बुंदेलखंड डकैतों की शरणगाह बन गया है।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लोगों को लगता है कि उनके साथ अन्याय हो रहा है उसका सही हिस्सा नहीं मिल पा रहा है वह अलग राज्य बनकर तेजी से विकास कर सकता है। इन राज्यों की मांग समीचीन है किन्तु नए राज्यों का गठन किस आधार पर और किस सीमा तक किया जाए इसका भी आकलन करना पड़ेगा। इसके लिए सर्वाधिक उपयुक्त होगा कि राज्य पुनर्गठन आयोग का गठन किया जाए और वह पूरे देश में राज्यों की जनसंख्या, भौगोलिक स्थिति तथा विकास को आधार मानकर कार्य करे। इसको ज्यादा दिनों तक टालना खतरनाक हो सकता है।

आजादी के पूर्व उत्तर प्रदेश काशी, अवध, बुंदेलखंड, रूहेलखंड हुआ करता था। अलग-अलग राजाओं का शासन था। ब्रिटिश संसद ने अवध तथा आगरा को मिलाकर संयुक्त प्रांत बनाया था। बाद में उत्तराखंड के हिस्सों को मिलाकर उत्तर प्रदेश कर दिया गया।

उत्तर प्रदेश का दुर्भाग्य आज भी पीछा नहीं छोड़ रहा है इसको नेतृत्व ने ही उपेक्षित रखने का काम किया है। सर्वाधिक प्रधानमंत्री और कुशल प्रशासक देने वाला, गंगा-यमुना जैसी नदियां और भरपूर उपजाऊ जमीन वाला प्रदेश आज विकास की दौड़ में पीछे खड़ा है। इसकी उपजाऊ जमीन जहां सभी फसलें पैदा करने में सक्षम है वही आज किसान, गरीब, मजदूर भूख से मर रहा है।

अंग्रेजी शासन से लड़ाई और बगावती तेवरों के परिणामस्वरूप उपेक्षा का दंश पूर्वाचल व बुंदेलखंड को झेलना पड़ा और यह विकास की दौड़ में पिछड़ते गए। पूर्वाचल जहां उद्योग शून्य क्षेत्र है वहीं बुंदेलखंड में प्रचुर खनिज होने के बाद भी उनका समुचित उपयोग नहीं हो पा रहा है। विकास के नाम पर इन क्षेत्रों में क्रमश: पूर्वाचल विकास निधि, बुंदेलखंड विकास निधि बनी, किंतु वह ऊंट के मुंह में जीरा साबित हुईं। यह संयोग ही कहा जाएगा कि 1953 में भी तमिलभाषी और तेलंगाना को लेकर पृथक राज्य की मांग उठी थी और पूरे देश में राज्य पुनर्गठन आयोग बना था। आज भी शुरुआत वहीं से हुई है।

लेखक भाजपा के वरिष्ठ नेता हैं

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