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भाजपा : ओवर टू भागवत एंड गडकरी

आडवाणी का जाना तय था। दिन तय नहीं था। शुक्रवार को शुभ घड़ी में आखिरकार उनकी विदाई पर भी मुहर लग गयी। बतौर नेता विपक्ष उनकी विदाई के साथ साथ संघ परिवार के मुखिया ने नया पार्टी अध्यक्ष भी तय कर दिया। बावन साल के ‘युवा’ नेता नितिन गडकरी ने भी पदभार संभाल लिया है। वाजपेयी संन्यास ले चुके हैं। आडवाणी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों से मुक्त यानी संन्यास की राह पर हैं। वे भले ये कहते रहें कि उनकी रथ यात्रा नहीं रूकेगी। लेकिन भाजपा के सारथी बदल चुके हैं। हेडगेवार भवन ने भाजपा की नयी पौध खड़ी करने के लिए जो ब्लूप्रिंट तैयार किया था उसको अमली जामा पहनाया जा रहा है। प्रसव पीड़ा का वक्त खत्म, घर में नया लाल आ चुका है। मगर संघ के आंगन में भाजपा के लिये क्या ये सही मायनों में नये युग की शुरूआत होगी।

आडवाणी, वाजपेयी और संघ लगभग हमउम्र हैं। 83 के आडवाणी, 85 के वाजपेयी। संघ भी अपनी 85वीं सालगिरह अगले वर्ष मनायेगा। वाजपेयी और आडवाणी तो हाड़-मांस के बने हैं। उनकी उम्र की सीमा तय की जा सकती है। लेकिन संघ तो सोच है, चिंतन है। भाजपा की आत्मा है। आत्मा सी अजर अमर है। संघ परिवार का दुख ही यही था कि भाजपा अपनी आत्मा से कम्प्रोमाइज कर रही है। वाजपेयी ने छह साल प्रधानमंत्री रहते संघ से दूरी बनाये रखी। आडवाणी भी प्रधानमंत्री बनने की फेर में जिन्नाह के रास्ते सेक्यूलर बनने की फिराक में रहे। संघ की यही कुलबुलाहट रही। पहले भारतीय जनसंघ को सींचा। भाजपा बनी तो उसे राष्ट्रीय पार्टी बनवाने के लिये राम मंदिर का मुद्दा परोस कर दिया। जिसकी बदौलत ही वह फली फूली और केन्द्र में छह साल सत्ता में रही।

एक सोच थी तो दूसरी उसकी उपज। लेकिन पूर्व संघ प्रमुख के सी सुदर्शन को दुख इस बात का रहा कि सत्ता के नशे में पार्टी परिवार के योगदान को ही भूल बैठी। लेकिन जब भागवत ने संघ की बागडोर संभाली तो अपना विराट रूप दिखाकर अपनी कूवत का ‘सु-दर्शन’ करवाया। लोकसभा में पार्टी की जबरदस्त हार के बाद फरमान दिया कि बदलाव जरूरी है। पार्टी को युवा नेताओं की दरकार है।

नये युग की ‘युवा’ भाजपा को किस ओर ले जाना चाहता है संघ। बावन के गडकरी और 59 के भागवत। जेनरेशन गैप न के बराबर है। तालमेल अच्छा होने की उम्मीद है। संघ की विचारधारा के साथ ये रथ किस ओर जायेगा। हर विचारधारा की एक उम्र तय होती है। फासिज्म की भी थी। अमेरिकी पूंजिवाद की भी उम्र हो चली है। चीन और भारत उसकी सोच के आगे अपनी बड़ी लकीर खींचने की जिद कर रहे हैं। लेकिन संघ क्या कोई बड़ी लकीर खींचेगा। क्या उसके फलसफे से नयी भाजपा खड़ी हो पायेगी।

खड़ी हुयी तो उसकी नींव भी क्या अकलियतों को डराने, धमकाने, मस्जिद को मंदिर बताने, और फिर उसे गिराने जैसी पाषाणकालीन विचारधारा पर होगी? गडकरी से ये उम्मीद रखना बेमानी होगी कि पार्टी अध्यक्ष बनने के बाद वो गुजरात दंगों में मारे गये लोगों के परिवार से मिलकर माफी मांगेंगे। और फिर रथ लेकर कंधमाल को कूच करेंगे और वहां भी परिवार के उपद्रवियों के हाथों सताये लोगों को गले लगायेंगे। गडकरी ने नया पदभार संभालते ही कहा कि वो दलितों और पिछड़ों के लिये काम करेंगे।

क्या उनके इस एजेंडे में मुस्लिम दलितों के लिये कोई स्थान होगा। क्या इनके उत्थान पर गडकरी कोई फ्रेश सोच दे पायेंगे। ये उम्मीद रखना भी बेमानी होगी। क्योंकि संघ युवा चेहरे तो चाहता है मगर फ्रेश या ‘आउट अ द बक्स’ सोच नहीं। संघ की विचारधारा को परे रखकर ही वाजपेयी प्रधानमंत्री बने। 24 पार्टियों के सर्वमान्य नेता बनने के लिए मंदिर मुद्दे के साथ-साथ धारा 370 और यूनीफार्म सिविल कोड के मुद्दे को भी ताक पर रख दिया। गठबंधन राजनीति का ये तकाजा भी था।

कश्मीर में शांति बहाल करने के पुख्ता कदम उठाये, पाकिस्तान के साथ कंटीले रिश्ते सुधारने के लिये मिसाल कायम की। मगर ये भी सच है कि वाजपेयी के कार्यकाल का ब्लैक चैप्टर भी संघ विचारधारा के कट्टर समर्थकों की वजह से लिखा गया। क्योंकि जब वाजपेयी दिल्ली में थे तो गुजरात में पार्टी में उनके सहयोगी ‘हिंदू राष्ट्र’ का निर्माण करने में जुट गये। खामियाजा वाजपेयी को दिल्ली में भुगतना पड़ा। वाजपेयी अपनों से ही हार गये। सोच जीती। आत्मा जीती। गडकरी एंड ब्रदर्स की पहचान क्या होगी। उनके सामने वही स्थिति है जो 1984 में पार्टी की थी। पार्टी नयी थी, लोकसभा की हार से टूट चुकी थी, आगे का रास्ता सूझ नहीं रहा था। तब मंदिर था। मंदिर पर चिंतन था। आज वो भी नहीं।

लेखक टेलीविजन पत्रकार हैं

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