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विश्व बंधुत्व

मित्रस्य या चक्षुषा सर्वाणि भूताणि समीक्षन्ताम
मित्र स्याहं चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षे
मित्रस्य चक्षुषा समीक्षामहे।

यजुर्वेद के इस मंत्र के अनुसार व्यक्ति द्वारा यह कामना की गई है कि संसार के सभी लोग मुझे मित्र की दृष्टि से देखे। मैं भी सभी को मित्र की दृष्टि से देखूँ। हम सब एक-दूसरे को मित्र की दृष्टि से ही देखें। सच तो यह है कि संसार को देखने की हमारी वैदिक सोच और दृष्टि यही रही है। व्यक्ति, समाज और देश भी इसी दृष्टि के अनुसार व्यवहार करता रहा है। इसलिए हम विश्व बंधुत्व में विश्वास करते हैं। हमारे जीवन दर्शन के चन्द आधारभूत सूत्रों में यह एक महवपूर्ण सूत्र रहा है।

इस तथ्य को साहित्य और दर्शन में भिन्न-भिन्न भावों और भाषाओं में व्यक्त किया जाता रहा है। हम अपने व्यवहार में ढ़ालते रहे हैं। तुलसीदास जी ने रामचरित मानस में कई स्थानों पर मित्र की महिमा बताई है।
‘धीरज धर्म मित्र अरू नारी
आपद काल परिखहि चारी।’
 
यहां मित्र को धीरज, धर्म और नारी की श्रेणी में रखा है। धीरज और धर्म तो मनुष्य की आंतरिक अवस्था है। नारी भी विशेष अंतरंग है। इन तीनों के श्रेणी में ही मित्र को रखा है। मित्र से भी इतनी ही अंतरंगता की अपेक्षा रहती है। मित्र की पहचान तब होती है जब व्यक्ति पर कोई विपत्ति आए। मित्र डटकर पास खड़ा रहता है। यदि वह मित्र भी विपत्ति देने वाले के साथ है तो वह मित्र नहीं, दुश्मन है। ऐसे ही मित्रों को देखने से भी पाप लगता है।

बहुत सारे सांसारिक दु:खों से मित्र ही पार उतारता है। वह वैसे समय में साथ खड़ा होता है। अपने पारिवारिक लोग भी संग साथ छोड़ जाते हैं। मित्रता एक भाव है। यह सारे संसार में प्रवाहित होता रहता है। यह भाव पशु-पक्षियों के साथ भी मनुष्य की मित्रता करवाता है। इसमें बड़े-छोटे का भेद नहीं होता। कृष्ण-सुदामा की मित्रता इसका उदाहण है। परिवार वालों से भी अधिक सुख देता है मित्र। इसलिए मित्र यदि धोखा देता है, व्यक्ति बर्दाश्त नहीं कर पाता।

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