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अखंड भारत के कुशल शिल्पी थे `लौह पुरुष'

सरदार वल्लभ भाई पटेल एक ऐसे लौह पुरुष थे जिन्हें आजादी के बाद भारत को अखंड विशाल राष्ट्र के रूप में स्थापित करने वाले शख्स के रूप में जाना जाता है। बहुत से लोगों का मानना है कि यदि पटेल को भारत का प्रधानमंत्री बनाया गया होता तो देश रक्षा शक्ति के मामले में आज के मुकाबले कहीं आगे होता।

31 अकतूबर 1875 को गुजरात के नाडियाद में जनमे सरदार वललभ भाई पटेल ने भारत को विशाल और अखंड राष्ट्र बनाने में अत्यंत महतवपूर्ण भूमिका निभाई और साथ ही हैदराबाद के निजाम जैसे कई अहंकारी राजा रजवाड़ों का मान मर्दन भी किया।

पटेल के जीवन पर शोध करने वाले प्रोफेसर राम रतन का कहना है कि वललभ भाई पटेल को सरदार का तमगा उनके साहसिक कारनामों की वजह से मिला था। वह कांग्रेस के भीतर जवाहर लाल नेहरु से भी अधिक लोकप्रिय थे।

उन्होंने कहा कि कांग्रेस के बहुत से सदस्य पटेल को आजाद भारत के पहले प्रधानमंत्री के रूप में देखना चाहते थे, लेकिन गांधी जी को लगता था कि प्रधानमंत्री के रूप में नेहरु अधिक उपयुक्त रहेंगे। पटेल ने महात्मा गांधी का पूरा सम्मान किया और वह नेहरु के प्रधानमंत्री बनने के रास्ते में बाधा नहीं बने।

देश जब आजाद हुआ तो पटेल देश के पहले उप प्रधानमंत्री तथा गृहमंत्री बने। उन्होंने अपने कुशल प्रबंधन से उन सभी छोटे बड़े राजा रजवाड़ों को भारत संघ में मिला लिया जो खुद की रियासतों को देश से अलग रखना चाह रहे थे।

पटेल अपनी बुद्धि ही नहीं, बल्कि शकित के लिए भी मशहूर थे। जब हैदराबाद का निजाम किसी भी कीमत पर भारत संघ में मिलने को तैयार नहीं हुआ तो उन्होंने बल प्रयोग करने की ठानी, लेकिन इस पर उन्हें अन्य नेताओं का समर्थन नहीं मिल पा रहा था। उस समय हैदराबाद एक बहुत बड़ी रियासत था, जिसमें वर्तमान आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और महाराष्ट्र के बहुत से हिस्से शामिल थे।

जब तात्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरु यूरोप की यात्रा पर गए तो पटेल कार्यवाहक प्रधानमंत्री बनाए गए। तभी लौह पुरुष ने भारतीय सेना को आदेश दिया कि हैदराबाद को भारत संघ में मिला दिया जाए।

इस पर भारतीय सेना ने हैदराबाद पर धावा बोल दिया और निजाम के समर्थन में लड़ने वाले तथा लोगों पर ज्यादती करने वाले हजारों रजाकरों को रौंद डाला। इस तरह हैदराबाद भारत का हिस्सा बन गया। पटेल के लिए हैदराबाद को संघ में इसलिए भी मिलाना अनिवार्य हो गया था कि वहां के 80 प्रतिशत लोग अखंड भारत में शामिल होना चाहते थे और निजाम उनके रासते में बाधा बन रहा था।

लौह पुरुष सरदार वललभ भाई पटेल ने भारत के लिए वही काम किया जो बिस्मार्क ने जर्मनी के लिए किया था। पटेल ने स्वतंत्रता संग्राम में भी बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया। भारत छोड़ो आंदोलन हो या फिर दांडी मार्च उन्होंने गांधी जी के हर आंदोलन में उनका साथ दिया।

उन्होंने बंटवारे के समय शरणार्थियों के पुनर्वास में भी महतवपूर्ण भूमिका निभाई। पंद्रह दिसंबर 1950 को दिल का दौरा पड़ने से लौह पुरुष का निधन हो गया। 1991 में उन्हें मरणोपरांत भारत रत्न से सम्मानित किया गया ।

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