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संत तिरुप्पनालवार

संत मुनिवाहन तिरुप्पनालवार के जन्म के विषय में केवल इतनी ही जानकारी मिलती है कि वे धान के खेत में एक टोकरी में पड़े हुए थे। उन्हें एक ऐसे व्यक्ति ने पालन-पोलन के लिए उठा लिया जो समाज में अस्पृश्य था और सफाई का काम करता था। लेकिन वह व्यक्ति गायन विद्या में बड़ा निपुण था। उसने इस बाल का नाम रखा ‘मुनिवाहन’। मुनिवाहन शैशव अवस्था से, अपने पालक पिता से गायन विद्या सीखने लगे थे। लेकिन वह वीणा बजाते समय केवल भगवान के नाम के अलावा कुछ नहीं गाते थे। वह जैसे-जैसे बड़े हुए- भगवान के प्रति उतना ही आकर्षण बढ़ता गया। एक दिन वह भगवान श्रीरंगनाथ के दर्शन करने गए, किन्तु उनके लिए प्रवेश वजिर्त था, क्योंकि वह समाज में तिरुप्पनलवार अर्थात अस्पृश्य वर्ग के थे। इस पर संतु मुनिवाहन अपनी निगुलापुरी बस्ती छोड़कर श्रीरंगनाथ क्षेत्र में आकर रहने लगे। उन्होंने कावेरी के दक्षिणी तट पर एक छोटी सी झोपड़ी बना ली और वहीं रहकर श्रीरंगनाथ जी का भजन-कीर्तन एवं ध्यान मनन करने लगे। जब विशेष पर्वो पर श्रीरंगनाथ जी के विग्रह की सवारी निकलती तो मुनिवाहन उनके दूर से दर्शन करके अपने को कृतार्थ करते। वह गाते- ‘नारायण शब्द के अतिरिक्त मैं किसी को नहीं जानता। इन नेत्रों ने जब एक बार श्रीरंगनाथ के मुखारविन्द का दर्शन कर लिया तो अब इन्हें और कोई वस्तु नहीं सुहाती। श्रीरंगनाथ ने मेरे हृदय को चुरा लिया है। मैं उनकी शोभा का क्या वर्णन करूं? उन्होंने मेरे हृदय और मन पर पूरा अधिकार कर लिया है।’

संत मुनिवाहन अपनी झोपड़ी में ही बैठकर श्रीरंगनाथ जी का गुणगान करने लगे। अचानक एक दिन उनके पास सारंगमा मुनि आए। उन्होंने कहा कि ‘भगवान ने मुझे स्वप्न में आदेश दिया है कि मैं आपको कंधों पर बिठाकर मंदिर में लाकर भगवान के दर्शन कराऊं।’ यह सुनकर संत मुनिवाहन धन्य हो गए। भगवान श्रीरंगनाथ का दर्शन पाकर उन्होंने कहा- ‘प्रभो! आपने मेरे कर्म की बेड़ियों को काट दिया और मुझे अपना बना लिया। आज आपके दर्शन प्राप्त कर मेरा जनम सफल हो गया।’

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  • Web Title:संत तिरुप्पनालवार