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मदारी तब और अब

हमें अपने बचपन की याद है। बड़े अभाव के दिन थे वह। मनोरंजन के नाम पर रेडियो सीलोन था, सिनेमा-घर थे और रीछ-बंदर, साँप का खेल दिखाने वाले मदारी-संपेरे। वह कभी रीछ को नचाते, कभी बंदर-बंदरिया की शादी करवाते। जन-सेवी संस्थाओं ने जब इंसान का कल्याण कर लिया तो उन्होंने पशु-कल्याण का बीड़ा उठाया। आरोप लगाया कि मदारी और संपेरे जानवरों की आज़ादी का हनन कर रहे हैं। जैसे आदमी को आज़ादी का हक है, वैसे ही जानवरों को भी। मदारी-संपेरों के लुप्त होने के कई कारण हैं। एक प्रमुख वजह बेजुबान जानवरों के हित-साधन में जुटी आदमियों की मुहिम है। इंसान, इंसानों के अलावा सबके कल्याण को कटिबद्घ है।
इधर नई पीढ़ी के ठाठ हैं। उनका जी बहलाने को मल्टीप्लैक्स हैं, मॉल हैं, टी़वी़ है, इंटरनेट है, लोकसभा का सीधा प्रसारण है। इन सबके बीच सपेरे-मदारी की हस्ती ही क्या है? इन्हें तो बेरोजगार होना ही था एक न एक दिन। उनकी नियति निश्चित थी जैसे बड़ों के सामने पिद्दी से कुटीर उद्योगों की, या मल्टीनेशनल पेय द्रव्यों के मुकाबले शर्बत-ठंडाई की। ऐसे भी विविधता तो थी नहीं, मदारी-संपेरे के मनोरंजन में। वही भालू का दो पैर का नाच, बंदर-बंदरिया का रूठना-मनाना, सांप का फन फैलाना। इधर विविधता बच्चों से लेकर युवाओं और कुँवारों से लेकर विवाहितों तक जीवन का मूल मंत्र है। प्रतिष्ठा का तकाजा है। तभी तो बच्चे चैनल बदल-बदल कर विविध कॉर्टून कथाओं में उलझते हैं, गोल्फ के टाइगर वुड, विवाह और दो बच्चों के बाप होकर दर्जनों प्रेम-सम्बन्धों में। सामान्य से हटकर कुछ भी हो तो मनोरंजन या खौफ का बायस है। जंगल में बसने वाला जानवर यदि आदमी जैसी हरकतें करे तो वह बच्चों को ही क्यों, बड़ों तक को लुभाती है। वहीं चौराहे पर ट्रैफिक के सिपाही की जगह कोई आतंकवादी गोली बरसाये या शेर दहाड़े तो अच्छे-अच्छों की सिट्टी-पिट्टी गुम होगी।
 
आज हालात फर्क हैं। जंगल में नक्सल हैं। शहरों में जहरीले सांप, हिंसक रीछ और नकलची बंदर। वर्दी में कानून-व्यवस्था के मदारी हैं। उनका इकलौता काम अति महत्वपूर्ण सियासी सांड़ों की सुरक्षा है। यह सूरमा कही जायें तो सड़क पर गिलहरी-खरगोश और खच्चर या मेंढक कहीं नजर न आयें। गधे होंची-होंची न करें। चील झपट्टा न मारें। वह डकारें तो कोई ऊधमी लंगूर पत्थर न दे फेंक। वख्त बचा तो वर्दीधारी मदारी उसका सदुपयोग निर्दोष को हड़काने में करते हैं। मदारी भी बदले हैं और मनोरंजन के मानक भी। पुराने तमाशों में धरा ही क्या है जब ’होता है शबे-रोज तमाशा मेरे आगे!’

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पांचवां एक-दिवसीय अंतरराष्ट्रीय मैच
अफगानिस्तान241/9(50.0)
vs
जिम्बाब्वे95/10(32.1)
अफगानिस्तान ने जिम्बाब्वे को 146 रनो से हराया
Mon, 19 Feb 2018 04:00 PM IST
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अफगानिस्तान241/9(50.0)
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जिम्बाब्वे95/10(32.1)
अफगानिस्तान ने जिम्बाब्वे को 146 रनो से हराया
Mon, 19 Feb 2018 04:00 PM IST
फाइनल
न्यूजीलैंड
vs
ऑस्ट्रेलिया
ईडन पार्क, ऑकलैंड
Wed, 21 Feb 2018 11:30 AM IST