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साफ हवा का वादा

कोपेनहेगन में जो भी हुआ, उसके बारे में यह कहा जा सकता है कि कुछ भी अप्रत्याशित नहीं हुआ। कोपेनहेगन वार्ता के अध्यक्ष डेनमार्क और दूसरे कई देशों ने पहले ही कह दिया था कि कोपनहेगन में कोई कानूनी बाध्यता वाला समझौता नहीं होगा। विकसित देश किसी कानूनी बाध्यता के खिलाफ थे क्योंकि उन्हें मालूम था कि वे किसी बाध्यता का पालन नहीं कर सकते। भारत और चीन जैसे देश इसके इसलिए खिलाफ थे क्योंकि विकसित देश इसका बोझ उन्हीं के सिर पर डालते। अफ्रीकी देश और दूसरे विकास की सीढ़ी पर सबसे पीछे खड़े देश जरूर चाहते थे कि कोई कानूनी बाध्यता वाला समझौता हो जाए क्योंकि पर्यावरण में परिवर्तन का सबसे बड़ा खामियाजा उन्हें ही भुगतना होगा और कार्बन घटाने के किसी भी समझौते में उन्हें फायदा ही होगा। लेकिन विकसित और बड़े विकासशील देशों के रवैये ने यह सिद्ध किया कि कोई भी अंतरराष्ट्रीय समझौता या संगठन तभी सफल हो सकता है जब वह कम से कम बाध्यकारी और ज्यादा से ज्यादा लचीला हो। लेकिन तमाम देशों के नेताओं की मजबूरी भी समझनी चाहिए। वे सबसे पहले अपने देश की जनता के प्रति जवाबदेह हैं और भारत जैसे देश के नेता तभी कोई बाध्यकारी समझौता स्वीकार कर सकते हैं जिससे उसकी जनता के विकास पर आंच न आए। आजादी के लंबे समय बाद भारत तेज विकास की राह पर आया है और अभी इस पर ब्रेक लगाने का भारतीय नेता सोच भी नहीं सकते। दूसरी ओर विकसित देश अपनी खर्चीली जीवन शैली के इतने आदी हो चुके हैं कि उनसे त्याग की अपेक्षा करना व्यर्थ है। जहां तक गरीब देशों का सवाल है, उनके पास त्याग करने को कुछ भी नहीं है। ऐसे में कोपनहेगन में क्या अच्छा ढूंढा जाए और सचमुच पर्यावरण को बचाने का क्या उपाय हो सकता है यह सोचना चाहिए।
पहली अच्छी बात तो यह हुई कि हम कुछ तो आगे बढ़े हैं और आइंदा जो विकास होगा, उसमें पर्यावरण की बात पहले सोची जाएगी और भविष्य में हम बेहतर लक्ष्य तय कर पाएंगे। यह कहा जा सकता है कि यह काफी नहीं है और इतने धीरे-धीरे आगे बढ़ने के लिए वक्त नहीं है। दो स्तरों पर युद्ध स्तर पर जुटना जरूरी है। एक, पर्यावरण को बचाने के लिए टेक्नोलॉजी और विज्ञान पर शोध बढ़ाया जाए और इसके नतीजे सबको सहज उपलब्ध करवाए जाएं। दूसरे कार्बन उर्त्सजन को कम करने के साथ प्रकृति की उन शक्तियों को मजबूत किया जाए जो प्रकृति को प्रदूषण से लड़ने में मदद करती हैं।

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