class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

नहीं गल रही अब गरीबों की दाल

मध्य वर्गीय परिवार खाद्य पदार्थो के बढ़ते हुए मूल्यों से आहत हैं। छठे वेतन आयोग की रिपोर्ट क्या आई महंगाई ने अपना रंग दिखाना शुरू कर दिया। अरहर की जो दाल एनडीए शासन काल में 38 रुपए किलो भी लोगों को महंगी लगती थी आज वह 80-90 रुपए किलो है। मसूर की दाल 22 रुपए से 68-70 रुपए, चीनी 14 से 32 रुपए और चावल 10 से 35 रुपए प्रति किलो तक पहुंच गए हैं। चीनी उत्पादन में भारत विश्व का सबसे बड़ा देश कहलाता है, फिर भी चीनी आयात की जा रही है। जनवरी 2009 में जहां चीनी का मूल्य 2100 रुपए प्रति क्विंटल था, वहां नवंबर 2009 में यह बढ़कर 3200 रुपए प्रति क्विंटल तक पहुंच गया।
आनंद मोहन भटनागर, लखनऊ

डाक बीमा योजना
डाक विभाग ने आम आदमी के लिए अनेक बचत योजनाएं चला रखी हैं, लेकिन जीवन बीमा सिर्फ सरकारी कर्मचारियों तक ही सीमित है। निजी कंपनियों के कई कर्मचारी बीमा कराना चाहते हैं, लेकिन डाक जीवन बीमा के मुकाबले दूसरी कंपनियों में अधिक प्रीमियम होने के कारण वे इस सुविधा से वंचित हैं। मेरा डाक विभाग व सरकार से अनुरोध है कि आम आदमी के लिए भी डाक बीमा योजना शुरु की जाए।
सुनील पिलानी, जी-1-460,जालमिल रोड, उत्तम नगर, नई दिल्ली।
 
गरीब समर्थक

सोनिया जी आज देश में सबसे ताकतवर हैं, लेकिन लगता है कि उनकी पार्टी के लोग उन्हें देश की असली तस्वीर नहीं दिखा रहे। आज महंगाई के इस दौर में कांग्रेस पार्टी को वोट देने वाला ही सबसे अधिक पिस रहा है। कहने को तो सरकार ने गरीब तबके को बहुत सारी सुविधाएं दी हैं, लेकिन वे उन तक पहुंचती ही नहीं। दिल्ली जैसे शहर में आज भी अनेक लोगों को महीने में दो हजार रुपए से अधिक पगार नहीं मिलती। इतने पैसे में आपका गरीब समर्थक कैसे जिंदा रह पाएगा?
पन्ना लाल, 136-6ए, ध्यान सिंह नगर, आनंद पर्वत, नई दिल्ली-110005.

जाम से निजात
सरकार मैट्रो व पुलों के निर्माण पर आज अरबों रुपए खर्च कर रही है, लेकिन फिर भी लोगों को ट्रैफिक जाम से निजात नहीं मिल रहा। समस्या की असली जड़ है कारों की बढ़ती तादाद। रोज बाजार में नई-नई गाड़ियां आ रही हैं। एक ही परिवार में कई-कई गाड़ियों का होना या घर के हर सदस्य की अपनी कार होना आज शान का प्रतीक बन गया है। अगर रोज-रोज के जाम की समस्या से छुटकारा पाना है तो गाड़ियों की खरीद पर अंकुश लगाना होगा वरना मैट्रो व पुलों के निर्माण पर खर्च किया जा रहा अरबों रुपया यूं ही पानी में बह जाएगा।
विनोद एस.एम, नई दिल्ली-110011

गन्ने का मूल्य
किसानों की असंतुष्टि की वजह सरकार द्वारा घोषित गन्ने का मूल्य है। गन्ने को लेकर करीब 15 वर्षो से चल रही कानूनी लड़ाई में किसानों के हक की पैरवी बड़ी चुनौती साबित हुई है। किसान-राजनीति करने वाले क्षेत्रीय दल कानूनी बारीकियों को समझे बिना किसान-आंदोलनों को गलत दिशा देते रहे हैं। जिस तरह से महंगाई तेजी से बढ़ रही है, उसी अनुपात में गन्ने का मूल्य भी तय करना चाहिए। लेकिन किसानों की सुनने वाला कौन है?
गंधर्व आनंद, अशोक विहार-1, दिल्ली

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:नहीं गल रही अब गरीबों की दाल