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थ्री-डी फिल्म

थ्री-डी फिल्म एक मोशन पिक्चर होती है जिसकी छवियां आम फिल्म से अलग बनती हैं। इमेज को रिकॉर्ड करने के लिए स्पेशल मोशन पिक्चर कैमरे का प्रयोग किया जाता है। थ्री-डी फिल्म 1890 के दौरान भी हुआ करती थी लेकिन उस दौरान इन फिल्म को थिएटर पर दिखा सकना काफी महंगा काम होता था। मुख्यत: 1950 से 1980 के अमेरिकी सिनेमा में ये फिल्में प्रमुखता से दिखने लगी।
थियोरिटिकल थ्री-डी इमेज प्रस्तुत करने का शुरुआती तरीका एनाजिफ इमेज होता है। ये तरीके इसलिए मशहूर थे क्योंकि इनका प्रोडक्शन और प्रदर्शन आसान था। इसके अलावा, इकलिप्स मैथड, लेंटीकुलर और बैरियर स्क्रीन, इंटरफेरेंस फिल्टर टेक्नोलॉजी और पोलराइजेशन सिस्टम इसकी प्रचलित तकनीक होती थी।
मोशन पिक्चर का स्टीरियोस्कोपिक युग 1890 के अंत में शुरू हुआ जब ब्रिटिश फिल्मों के पुरोधा विलियम ग्रीन ने थ्री-डी प्रक्रिया का पेटेंट फाइल किया। फ्रेडरिक युजीन आइव्स ने स्टीरियो कैमरा रिग का पेटेंट 1900 में कराया। इस कैमरे में दो लैंस लगते थे जो एक दूसरे से 3/ 4 इंच की दूरी पर होते थे। 27 सितंबर, 1922 को पहली बार दर्शकों को लांस एजिल्स के अंबेसडर थिएटर होटल में ‘द पावर ऑफ लव’ दिखाई गई।
सन 1952 में पहली कलर स्टीरियोस्कोपिक फीचर वान डेविल बनाई गई। इसके लेखक, निर्माता और निर्देशक एम.एल.गुंजबर्ग थे। स्टीरियोस्कोपिक साउंड में बनी पहली थ्री-डी फीचर ‘हाउस ऑफ वैक्स’ थी। थ्री-डी बाजार में वॉल्ट डिजनी ने 28 मई, 1953 में कदम रखा।

 

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