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झगड़े में बिजली गई, थर्मल मिली न सोलर

सौर ऊर्जा प्लांट लगाने के लिए ग्रामीणों ने नेडा में एक लाख 62 हजार रुपए जमा किए। नेडा ने काम भी शुरू कर दिया। लेकिन पावर कारपोरेशन ने कहा कि गाँव में थर्मल बिजली लगेगी। नेडा ने काम रोक दिया।

ग्रामीणों को पैसा भी वापस कर दिया गया। लेकिन तीन साल बाद भी गाँव में थर्मल बिजली लगी न सोलर लाइट।  कार्बन उत्सजर्न में कटौती के संकल्प के साथ कोपेनहेगन सम्मेलन खत्म हो गया लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और है।

केन्द्र के ‘दूरस्थ गाँव विद्युतीकरण कार्यक्रम’ के तहत बाराबंकी के सीमान्त पर घाघरा नदी के किनारे बसे बतनेरा गाँव के 12 मजरों में सौर ऊर्जा प्लांट लगने थे। दस फीसदी अंशदान के रूप में ग्रामीणों ने एक लाख 62 हजार रुपए जमा कर दिए। बाकी 90 फीसदी अंश केन्द्र व राज्य सरकार को देना था। नेडा ने एक मजरे में 50 सोलर लाइटें लगा भी दीं। 

इसी बीच पावर कारपोरेशन के अधिशाषी अभियन्ता ने नेडा को पत्र लिखा कि इस गाँव व मजरों में राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतीकरण का कार्य प्रस्तावित है। यह पत्र पाते ही नेडा ने काम रोक दिया। नियम है कि थर्मल विद्युतीकरण होने पर गाँव में वैकल्पिक योजना पर काम नहीं हो सकता।

फिर शुरू हुआ ग्रामीणों का संघर्ष। लेकिन तीन साल बाद भी यहाँ न तो नेडा ने लाइट लगाई न पावर कारपोरेशन ने तार बिछाए। गाँव की प्रधान मनोरानी ने कहा कि दो विभागों के झगड़े में हमारा गाँव पिस गया है।

कई स्तरों पर गुहार पर भी बिजली न लगी तो गाँव वाले हाईकोर्ट गए। कोर्ट की फटकार पर नेडा ने अपनी मजबूरी बता दी। कोर्ट ने कहा कि ग्रामीण सोलर लाइट लगाने का दूसरा प्रस्ताव नेडा को दें और नेडा उस पर निर्णय ले।

यह मुकदमा डिस्पोज ऑफ कर दिया गया। नेडा ने फिर पुरानी बात दोहराई कि यह मजरे पावर कॉरपोरेशन द्वारा विद्युतीकरण के लिए स्वीकृत हैं। ग्रामीणों ने हाईकोर्ट में फिर अपील की और इस बार पावर कॉरपोरेशन को पार्टी बनाया।

कॉरपोरेशन के अधिशाषी अभियन्ता सुनील कुमार ने बताया कि राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतीकरण योजना में गाँव के सभी मजरे स्वीकृत हैं। योजना के दूसरे चरण की मंजूरी के बाद ही काम शुरू होगा। सूत्रों ने बताया कि दूसरे चरण की योजना में धनराशि की मंजूरी में अभी दो साल और लेगेंगे।

इस गाँव के लिए धन स्वीकृत अगली पंचवर्षीय योजना में होगी। यानी अब बतनेरा गाँव और उसके मजरों में सस्ती सोलर लाइट लगाने का सपना पूरा नहीं हो सकता। क्योंकि ये मजरे अब नए मानकों में फिट नहीं बैठते। ग्रिड से थर्मल बिजली के लिए उन्हेंतीन साल और इंतजार करना पड़ेगा।

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