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जरा संभलकर! भत्तों पर ये नए टैक्स भारी पड़ेंगे

देश के करोड़ों वेतनभोगी कर्मचारियों के लिए यह अच्छी खबर कतई नहीं है। केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी) ने शुक्रवार को भत्तों पर टैक्स लगाने के जिस नए सिस्टम का ऐलान किया है, न सिर्फ उसकी टाइमिंग गलत है, बल्कि वह मध्यवर्गीय वेतनभोगियों पर टैक्स का बोझ भी बढ़ा सकता है।

आइए देखते हैं कि वास्तव में क्या हुआ है और एक आम वेतनभोगी के लिए उसके क्या मायने हैं-
क्या पृष्ठभूमि है : पूर्व वित्तमंत्री पी चिदंबरम ने वर्ष 2005 में कर्मचारियों के वेतन भत्तों पर टैक्स लगाने की पुरानी व्यवस्था को उलटकर फ्रिंज बेनेफिट टैक्स (एफबीटी) नाम का नया सिस्टम शुरू किया था। पहले दिन से ही इंडस्ट्री में खासे बदनाम होनेवाले इस सिस्टम से सरकार को उम्मीद थी कि उससे टैक्स कलेक्शन काफी बढ़ जाएगा लेकिन बाद में उसे अहसास हुआ कि यह एक किस्म का गुनाहे बेलज्जत था। बमुश्किल 7 फीसदी एफबीटी रेट से कुल टैक्स कलेक्शन उम्मीद से बहुत कम रहा। एक तथ्य यह उभरा कि एफबीटी वास्तव में वेतनभोगी कर्मचारियों और कंपनियों के फायदे में गया और उनका टैक्स बोझ कम ही हो गया। यही वजह थी कि पिछले दो-तीन साल में एफबीटी को लेकर हायतौबा लगभग खत्म हो गई थी। इसीलिए नए वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी ने पिछली जुलाई में पेश आम बजट में एफबीटी की विदाई का ऐलान किया और वादा किया कि जल्दी ही वे भत्तों पर टैक्स लगाने के नए नियम घोषित कर देंगे।

शुक्रवार को क्या हुआ: सरकार ने बजट वादे के मुताबिक एफबीटी की जगह लेने वाले नए नियम घोषित कर दिए। इनमें सिर्फ कार से जुड़े भत्तों जैसी एक-दो चीजों को छोड़कर तमाम नियम वही हैं जो 2005 में एफबीटी लागू होने से पहले वजूद में थे। लेकिन इन नए नियमों से सबसे बड़ा फर्क यह पड़ा है कि अब सारे भत्ते एम्पलाई यानी कर्मचारी के हाथ में आने के बाद टैक्सेबल होंगे। एम्पलायर यानी कंपनी या विभाग बीच में नहीं रहेगा। प्रमुख भत्तों की एवज में कितने रुपये कर्मचारी की मासिक आय में जोड़े जाएंगे, यह तय कर दिया गया है। नया सिस्टम 1 अप्रैल 2009 से यानी पिछले प्रभाव से लागू होगा।
कहां कितनी टैक्स योग्य इनकम: नए नियमों के मुताबिक अब अगर किसी छुट्टी के टूर को कंपनी द्वारा प्रायोजित किया गया है तो टूर के पूरे खर्चे को आपकी टैक्स योग्य इनकम में जोड़ दिया जाएगा। इसी तरह कंपनी या विभाग अगर 5000 रुपये से ज्यादा की गिफ्ट कर्मचारी को देता है तो इस रकम को भी टैक्स के दायरे में डाल दिया जाएगा। गैस, बिजली, पानी, स्वीपर या माली का वेतनखर्च, क्लब मेंबरशिप आदि का खर्च अगर कंपनी से मिलता है तो उस पर भी टैक्स लगेगा। ई-सोप्स के शेयर जिस दाम पर कंपनी से मिले थे, उसे उन शेयरों की मौजूदा मार्केट वेल्यू से घटाकर बनी राशि को भी टैक्स योग्य इनकम में जोड़ा जाएगा। अगर आप कंपनी से मिली छोटी कार इस्तेमाल करते हैं तो प्रति माह 1800 रुपये के हिसाब से पूरे साल में 21 हजार 600 रुपये आपकी सेलरी में जुड़ जाएंगे और उस पर टैक्स बनेगा। अगर बड़ी कार मिली हुई है तो 2400 रुपये प्रति माह के हिसाब से टैक्स योग्य आय में हर साल 28,800 रुपये जुड़ेंगे। मोटे तौर पर कह सकते हैं कि एफबीटी से पहले जिस तरह भत्तों का खर्च टैक्सेबल इनकम में जुड़ जाता था वैसा ही अब होगा।
कहां क्या गलत हुआ: एक्सपर्ट बिरादरी पहले ही इशारा कर चुकी है और कर्मचारी यूनियनें आने वाले दिनों में इस पर हायतौबा करेंगी। कुल मिलाकर नए सिस्टम से चार सवाल उभरे हैं:
(1) वित्तवर्ष में अब सिर्फ तीन माह बचे हैं। बहुत से कर्मचारियों का टैक्स बोझ नए कैलकुलेशन में बढ़ जाएगा। न सिर्फ बढ़ जाएगा बल्कि उन्हें पिछले महीनों का टैक्स आने वाले तीन माह में एकमुश्त चुकाना होगा जिससे टेकहोम सेलरी यानी हाथ में आने वाला वेतन काफी कम रह जाने की आशंका है।
(2) नया सिस्टम दिसंबर के अंत में घोषित किया गया है जब कर्मचारी वर्ग टैक्स सेविंग के लिए इनवेस्टमेंट प्लानिंग करता है। ऐसे में नया टैक्स बोझ उसका बजट बिगाड़ सकता है।
(3) बहुत सी कंपनियां चालू वित्तवर्ष के लिए एफबीटी की एडवांस किस्त चुका चुकी है। उसका अब क्या ट्रीटमेंट होगा, यह अभी स्पष्ट नहीं किया  गया है।
(4) बहुत से कर्मचारियों का तो अब टैक्स स्लैब ही बदल जाएगा। चूंकि ऊंचे वेतन वर्ग पर लगने वाला टैक्स सरचार्ज खत्म हो चुका है नए सिस्टम का ज्यादा बुरा असर मध्यवर्गीय कर्मचारी पर पड़ेगा जो 5 लाख इनकम वाले 20 प्रतिशत के स्लैब से निकल कर 30 प्रतिशत वाले स्लैब में आ सकता है।
वैसे सबसे बड़ा सवाल तो यही है कि जब 2005 से पहले वाले भत्ता नियमों को ही बहाल करना था तो ऐलान में पूरी एक छमाही का वक्त क्यों लिया गया? यह काम तो कुछ हफ्तों में भी हो सकता था!

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