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इस सड़क पर चलने में डर क्यों लगता है?

पिछले हफ्ते जब छोटे राज्यों के गठन पर लेख लिखा था तो उम्मीद नहीं थी कि राजनीतिक झरनों का पानी इतनी तेजी से उफन पड़ेगा। पता नहीं कैसी-कैसी मांगें सामने आने लगी हैं? हिमाचल को चंडीगढ़ चाहिए तो आशंका के अनुरूप रायलसीमा और कुर्ग में भी फुसफुसाहटें शुरू हो गई हैं। कुछ लोग अभी से मुख्यमंत्री बनने के ख्वाब देखने लगे हैं तो कुछ उनको गिराने की योजना बनाने में उलझे हुए हैं। ऐसे में असल मुद्दा पीछे रह गया है। वह मुद्दा है-आम आदमी की बेहतरी।

आखिर ये छोटे राज्य बनाए क्यों गए थे? कहीं भाषाई अस्मिता का सवाल था, तो कहीं सांस्कृतिक पहचान का संकट। आमतौर पर माना यह जाता है कि समान विचार वाले लोग बहुत तेजी से बढ़ते हैं। पर ऐसा है क्या? इस उदाहरण पर गौर फरमाएं। जिन लोगों ने अपनी मर्जी से पाकिस्तान बनाया था, वे आज किस दशा में जी रहे हैं? वह पाकिस्तान जो लोगों के सपनों में आदर्श देश हुआ करता था, अपनी अखण्डता को 30 साल भी सुरक्षित नहीं रख पाया। 1975 में पूर्वी पाकिस्तान के लोग सशस्त्र क्रांति के जरिये सम्प्रभु राष्ट्र में तब्दील हो गए। अब तो लोग यह भूलने लगे हैं कि बांगलादेश कभी पूर्वी पाकिस्तान हुआ करता था? दुर्भाग्य से यह विभाजन भी भाषा और क्षेत्रीयता के आधार पर ही हुआ था। पूर्वी पाकिस्तान के लोग मानते थे कि उन्हें पंजाबी परस्त सियासत का शिकार होना पड़ता है। आम चुनाव में जब शेख मुजीबुर्रहमान का पलड़ा भारी हुआ था तो उसे मौजूदा पश्चिमी पाकिस्तान के लोगों ने नकार दिया था। उसके बाद जो हुआ, वह हम सबका जाना-बूझा इतिहास है। पाकिस्तान दो टुकड़ों में बंट गया और इसी के साथ कई हिस्सों में बिखर गई वह अवधारणा जो एक धर्म के नाम पर रची-बुनी गई थी।

अफसोस इस बात का है कि वह विभाजन भी मुकम्मल साबित नहीं हुआ। बांगलादेश अभी तक राजनीतिक अस्थिरता का शिकार है और पाकिस्तान एक बार फिर खील-खील होकर बिखरने की आशंकाओं से सिहर रहा है। जिस मजहब के नाम पर इस देश की नींव रखी गई थी उसी को कुछ कठमुल्लों ने अगवा कर लिया है। आज वहां की सरकार से ज्यादा धर्म के नाम पर छुट्टे घूम रहे आतंकवादी गिरोह ताकतवर हैं। पूरी दुनिया कहती है। लश्करे-तैयबा के संस्थापक हाफिज सईद को गिरफ्तार करो। गिरफ्तारी होती है पर अदालत उसे मुक्त कर देती है। यह समूची व्यवस्था के फेल हो जाने का प्रतीक है। सईद और उस जैसे लोग आज भारत से ज्यादा पाकिस्तान के लिए खतरा बन गए हैं। वजीरिस्तान में सही अर्थो में किसी की हुकूमत नहीं है। इस्लामाबाद की सरहदों को कभी भी तालिबान पार कर सकते हैं। ओबामा जब यह कहते हैं कि हम आतंकवादियों को पाकिस्तान की सरहद में घुसकर मारेंगे, तो वह एक मुल्क के ही पराभव का नहीं बल्कि वहां के वाशिंदों के आत्मसम्मान के पतन का भी प्रतीक है। सच है। बिखरे हुए लोगों और टूटते राष्ट्रों की परवाह किसी को नहीं होती।

हम मानते हैं कि भाषा, धर्म, संस्कृति और परंपरा का एक निश्चित रोल है। हम उसे जब अपने ऊपर थोप लेते हैं, तो गैरजरूरी समझौतों की ऐसी श्रृंखला में फंस जाते हैं जिससे बचना नामुमकिन होता है। पाकिस्तान और वहां के लोग इसके सबसे बड़े उदाहरण हैं। अब अपने ही देश में देख लीजिए। पंजाब में जब कुछ लोगों ने ‘पंथ’ के नाम पर अपना अंधा राज चलाने की कोशिश की तो शुरूआती दौर में वे सफल होते दिखे, पर बाद में उन्हें अपनी ही सरजमीं पर मुंह की खानी पड़ी। यह करिश्मा किसी ‘आपरेशन ब्लू स्टार’ या ‘आपरेशन ब्लैक थंडर’ से नहीं हुआ था। पंजाब के चमकते सामाजिक तानेबाने ने आतंक के अंधियारे को मार भगाया था। जम्मू-कश्मीर में भी यही नेक रवायत दोहराई जा रही है। घाटी को कुछ लोगों ने आग में बरसों-बरस झोंका, पर वहां के साझा समाज और इतिहास ने इस आग को ठंडा करना शुरू कर दिया है। जब घाटी के कुछ अलगावपरस्त विभाजन की जिन्ना थ्योरी को हवा में उछालते हैं, तो उसे जम्मू और लद्दाख के लोग हवा में ही लपक लेते हैं। धीमे-धीमे घाटी के लोगों की समझ में आ गया है कि यदि उन्हें जम्मू के लोगों जैसा सम्पन्न बनना है तो बंदूक और बंदूकचियों को अपने घरों से बाहर निकाल फेंकना होगा। वह लौटता हुआ सुकून इसी नेकनीयती की उपज है।

आप कह सकते हैं। बात हिन्दुस्तानी सूबों के पुनर्गठन की हो रही थी, यह पाकिस्तान और बांगलादेश कहां से बीच में आ गए? ये तो देश हैं। हमें भूलना नहीं चाहिए कि ये कभी अविभाजित भारत के सूबे ही होते थे। खैर, फिर से राज्यों के बंटवारें के मुद्दे पर आते हैं। पुनर्गठन की मांग उछालने वाले लोग कौन हैं? वही सियासतदां , जो सिर्फ सत्ता की बंदरबांट करना चाहते हैं। मैं पूरे अदब के साथ फिर से कहना चाहता हूं कि मैं छोटे राज्यों के गठन के खिलाफ नहीं हूं, परंतु हमें इसकी मांग उठाने वालों की मंशा की जांच-परख जरूर कर लेनी चाहिए। वे कितने नेकनीयत हैं? आज उत्तर प्रदेश को तीन हिस्सों में बाँटने की मांग करने वाले लोग कौन हैं? उन्होंने इस प्रदेश का कितना भला किया है? आखिर यही वे लोग हैं जो सत्ता सदनों से सड़क तक हुकूमत का सुख लूटते रहे हैं। वे अपने सुख को और बढ़ाना चाहते हैं। इसे चिरस्थायी करना चाहते हैं। यही नहीं विरासत के तौर पर उसे अपने वंशजों को सौंप देना चाहते हैं। अगर कुछ समझदार लोगों की यह आशंका सच है तो हमें इन नेताओं से सीधे सवाल करने होंगे। उनके झांसे में आना खतरनाक साबित हो सकता है।

हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि कोई भी व्यवस्था अंतिम नहीं होती। कानून के बारे में कहा जाता है कि उसके अमल में आने से पहले ही लोग उसे तोड़ने का तरीका ढूंढ़ लेते हैं। इसी तरह व्यवस्थाएं भी सदिच्छाओं से चलती हैं। यदि उनका दुरुपयोग शुरू कर दिया जाता है तो फिर वे खुद-ब-खुद जीते-जागते श्रप में तब्दील हो जाती हैं। दो हफ्ते पहले रांची से जमशेदपुर आते समय गाड़ी की खिड़की से बाहर झांकता हुआ मैं यही सोच रहा था। झारखंड के  लोगों को जिन नेताओं ने उजली सुबह के सपने दिखाए, उन्होंने ही उन पर भ्रष्टाचार की कीचड़ थोप दी। वह सड़क आज भी लगभग वैसी ही है, जैसी 20 साल पहले हुआ करती थी। पर अर्धसैनिक बलों के जवान और उनके बंकर यह जरूर बताते हैं कि भोले और भले लोगों का अमन-चैन छिन गया है। बंदूक चाहे सिपाही के हाथ में हो या फिर किसी आतंकवादी  के, वो सिर्फ जान लेती है। मैं दुख के साथ सोच रहा था कि इस राजपथ पर कभी हम आधी रात को निर्भय होकर चला करते थे। आज दिन का सफर कितना डरावना हो गया है? अगर बंटवारा यही देता है तो हमें नहीं चाहिए कोई और विभाजन।
 shashi.shekhar@hindustantimes.com

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