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दिलीप चित्रे का सृजनात्मक अन्वेषण

मराठी के प्रख्यात कवि, गद्यशिल्पी, आलोचक, अनुवादक, फिल्मकार और चित्रकार दिलीप चित्रे गत दस दिसंबर को महाप्रस्थान कर गए। वे 71 वर्ष के थे। उनका निधन साहित्य-कला-संस्कृति जगत के लिए भारी क्षति है ही, मेरे लिए व्यक्तिगत क्षति भी है। उनसे कई वर्षों का नाता था। दिलीप से मेरा पहला परिचय कई साल पहले फ्रैंकफुर्त में हुआ था। उसके बाद कई सभा-समारोहों में उनसे भेंट होती रही। उनकी रचनाएं पढ़ने के बाद नाता और गाढ़ा हुआ। दिलीप से मेरी आखिरी मुलाकात छह साल पहले कोलकाता में 22 मार्च 2003 को हुई थी, जब वे भारतीय भाषा परिषद का रचना समग्र पुरस्कार लेने आए थे। उसके बाद फोन पर ही उनसे संपर्क होता रहा। मुझे जब पता चला कि उन्हें कैंसर हो गया है, तभी से हमारी चिंता बढ़ गई थी। दिलीप की इकलौती संतान की भोपाल गैस त्रसदी में मौत हो गई थी। अब घर में दिलीप की पत्नी विजया अकेली हैं।

मुझे याद है कि दिलीप की कुछ रचनाएं हमने बांग्ला में अनुवाद कर छापी थीं तो उन्हें बांग्ला जगत ने हाथोंहाथ लिया था। शायद इसकी एक वजह वैचारिकता की अंत:सलिला का उनकी रचनाओं में बहना है। वैचारिकता उनकी कविताओं को (और गद्य रचनाओं को भी) बहुत ताप देती है। अपनी कविताओं में दिलीप ने जीवन-जगत के सवालों पर अत्यंत आवेग और बौद्धिकता से विचार किया है। दिलीप ने स्कूली जीवन से ही कविता लिखना शुरू कर दिया था। उनकी पहली कविता ‘सत्यकथा’ में तब छपी थी, जब वे महज 16 साल के थे और उनकी कविताओं का पहला संग्रह जब आया, तब वे महज 22 साल के थे। सर्जनात्मक अन्वेषण इन कविताओं की सबसे बड़ी खासियत है। उनके काव्य संग्रहों-‘एंबुलेंस राइड’, ‘कवितेनंतरच्या कविता’ और ‘ट्रेवलिंग इन ए केज’ में जीवन की बहुरंगी छवियां हैं। वे बहुत अच्छी छवियां बनाते भी थे। उनकी अनेक चित्रकृतियों को बहुत सराहना मिली।
    
दिलीप कविता के अच्छे पाठक भी थे और जो कविताएं भा जाती थीं, उनका झटपट अनुवाद भी कर डालते थे। उन्होंने सोलहवीं शती के मशहूर मराठी संत तुकाराम की कविताओं का अंग्रेजी में अनुवाद किया, जिसे विश्वव्यापी ख्याति मिली। दिलीप ने कई अन्य मराठी कवियों की कविताओं का भी अंग्रेजी में अनुवाद ‘एंथालाजी’ के लिए किया और बाद में अंग्रेजी में वह किताब भी आई-‘ऐन एंथालाजी आव मराठी पोएट्री।‘

यूरोप के सात बड़े कवियों के रचनात्मक अवदान पर की गई दिलीप की समालोचना से हम समझ सकते हैं कि वे कितने बड़े आलोचक व्यक्तित्व के धनी थे। दिलीप ने जब नारायण सुर्वे की कविताओं की पहली किताब की समीक्षा लिखी, तो उसके बाद ही साहित्य जगत का ध्यान कवि पर गया था। दिलीप ने नामदेव ढसाल की कविताओं का अंग्रेजी में अनुवाद कर उन्हें अंतर्राष्ट्रीय फलक पर पहुंचाया। अनुवाद के समानांतर दिलीप का मौलिक लेखन गद्य की दूसरी विधाओं में भी चलता रहा। उनकी कहानियों के संग्रह ‘आफियस’, यात्रा संस्मरण ‘शीबारानीच्या शोधात’ और ‘चाव्या’ (निबंध संग्रह) को बहुत मूल्यवान कृतियां माना जाता है। ‘शीबारानीच्या शोधात’ यानी रानी शीबा की खोज में। यह किताब 1971 में आई थी और पर्याप्त समादृत रही थी।

दिलीप के जीवन के कई साल विदेशों में बीते। बाइस साल की उम्र में वे अंग्रेजी पढ़ाने के लिए इथियोपिया चले गए। तीन साल अकेपिया में रहे। यूरोप व अमेरिका के कई शिक्षण संस्थानों में वे विजिटिंग प्रोफेसर रहे। मुझे यह देखकर विस्मय होता है कि दिलीप ने एक ही जीवन में कितने जीवन जिये। कई फिल्में भी बनाईं तो कई की पटकथाएं लिखीं। उन्होंने ‘गोदाम’ का निर्देशन किया। शशिकपूर की फिल्म ‘विजेता’ की पटकथा व संवाद भी लिखा। उन्होंने कुछ नाटक भी लिखे। अखबारों के लिए कॉलम लिखे। ‘क्वेस्ट’ में तो निरंतर लिखा। ‘शब्द’ नामक पत्रिका का संपादन किया। दिलीप ऐसे विलक्षण लेखक थे जिन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार तो मिला ही, साहित्य अकादमी का अनुवाद पुरस्कार भी मिला। साहित्य-कला-संस्कृति में अनुपम अवदान के लिए उन्हें कईं पुरस्कार मिले थे किंतु सच्चा और आत्मीय पुरस्कार पाठकों का मिला था, जो विरले लोगों को ही नसीब होता है। दिलीप जहां भी गए, अपनी सर्जनात्मकता की छाप छोड़ी। चाहे ‘वागार्थ’(भारत भवन) के निदेशक के रूप में उनका कार्यकाल रहा हो या साठ के दशक में एक बड़ी कंपनी में बड़े पद पर काम करने का कार्यकाल या फिर ए़ बी़  शाह के साथ शोध का काम, हर जगह उन्होंने अपनी रचनात्मक ऊर्जा का परिचय दिया। कहने की जरूरत नहीं कि रचनात्मकता के कारण ही दिलीप बचे रहेंगे। 

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