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सूचना युग में घटती पठनीयता

जाने-माने संचार वैज्ञानिक मार्शल मैक्लुहन ने अपनी पुस्तक ‘मीडियम इज द मैसेज’ में 50 के दशक में भविष्यवाणी की थी कि ‘सूचना क्रांति के चलते दुनिया बहुत ही छोटी हो जायेगी। इतनी छोटी कि उसे ‘ग्लोबल विलेज’ की संज्ञा दी जायेगी।’ मैक्लुहन की भविष्यवाणी बिल्कुल ही सच साबित होने लगी है। परन्तु चाहे पुस्तक पाठन हो, पत्रिका पाठन हो, उपन्यास-कहानी पाठन हो या फिर समाचार-पत्र। हर स्थिति में लोगों के पढ़ने की आदतों में भारी गिरावट आयी है। इससे सूचना से विवेक तक की यात्रा कठिन हो गयी है।

‘वर्ल्ड एसोसिएशन ऑफ न्यूज पेपर्स’ के अनुसार पिछले 15 वर्ष में भारत में 7 प्रतिशत, अमेरिका में 5 प्रतिशत, यूरोप में 3 प्रतिशत और जापान में 2 प्रतिशत पाठक अखबारों ने खो दिये हैं। साठ के दशक में पाँच में से चार अमेरिकी रोजाना अखबार पढ़ते थे। अब यह संख्या घटकर दो यानी की आधी हो गई हैं। ‘वैनिशिंग न्यूज पेपर - सेविंग जर्नालिज्म इन द इनफॉर्मेशन एज’ के लेखक फिलिप मेयर का मत है, ‘अगर यही ट्रेंड जारी रहा तो अप्रैल 2040 में आखिरी पाठक अखबार की प्रति रद्दी की टोकरी में डाल देगा।’

ईमेल, वीडियों कांफ्रेंसिंग, मोबाईल, ई पेपर और अन्य डिजिटल माध्यमों ने विचार के आदान-प्रदान, मनोरंजन, मानवीय संबंधों आदि को सरल से सरलतर कर दिया है। इस वर्ष अप्रैल के ‘द इकानॉमिस्ट’ में प्रकाशित एक लेख के अनुसार ‘पश्चिम देशों में छपे अखबारों की तथा कथित मृत्यु की तिथि ब्रॉड बैंड इंटरनेट की वजह से करीब आती जा रही है।परन्तु स्मरण रहे कि इस तकनीक ने समाचार-पत्रों और पत्रिकाओं के पुराने प्रतिद्विन्दयों-टेलीविजन एवं रेडियों को नया रूप, नया आकार व नई दिशा प्रदान की है। इसी कारण से लगभग सभी समाचार-पत्रों एवं पत्रिकाओं ने भी अपनी-अपनी वेबसाइट को निर्मित और विकसित किया है। इनमें लिखने वाले स्तंभकार और ब्लॉग लेखक भी आजकल त्वरित गति से तैयार किये जा रहे हैं।’

इस दौर में ब्लॉग पत्रकारिता यानि कि चिट्ठाकारिता का जन्म हुआ है जिसने धीरे-धीरे पत्रकारिता एवं जनसंचार के मूलभूत सिद्धांतों का उल्लंघन करना आरंभ कर दिया है। फलत: पत्रकारिता के आधरभूत तत्व जैसे तथ्यपरक्ता, यर्थाथवादिता, वस्तुनिष्ठता और संतुलन कहीं-न-कहीं विलुप्त होत नजर आती है। इसलिए अखबारों की विश्वसनीयता पर भी अब प्रश्न-चिन्ह लगने लगा है। समाचारों के फीचरीकरण, विचारीकरण और संपादकीयकरण ने समाचारों की वस्तुनिष्ठता को अलविदा करना आरंभ कर दिया है। समाचार से ही विचार पैदा होते हैं। इसलिए समाचारों पर आधारित विचार तो स्वागतयोग्य हो सकते है। परन्तु विचारों पर आधरित समाचारों को एक स्वीकार नहीं किया जा सकता। दूसरी ओर अखबारों में ऐसी उभरती हुई प्रवृत्तियों की लंबी कतार देखते-देखते आज का पाठक वर्ग अखबार पढ़ना बंद करके, अखबार भी दूरदर्शन की तरह ही देखने लगा है तथा रेडियो की तरह अन्य पाठकों से सुनने भी लगा है। यहाँ पर भी ‘जो बिकता है, वही दीखता है वाली बात चरितार्थ होने लगी है। इन कारणों से अखबारों की पठनीयता तो घटी ही है। साथ-साथ इंटरनेट, टेलीविजन, अखबार का इंटरनेट संस्करण, ई-पेपर, पोर्टल, चिट्ठाकारिता आदि ने भी पाठकों की पढ़ने की आदतों को प्रतिकूल रूप से प्रभावित किया है। यूँ तो सेवानिवृत्त लोगो में अखबार पढ़ने की प्रवृत्ति सर्वाधिक पायी जाती है। परन्तु नयी पीढ़ी के बच्चों और युवाओं से अखबारों का दामन छूटता जा रहा है।’

आज से लगभग 84 वर्ष पूर्व सन 1925 में वृंदावन के हिन्दी-साहित्य-सम्मेलन में आयोजित प्रथम संपादक सम्मेलन में अयक्षता कर रहे बाबू राव विष्णु परोड़कर जी ने यह भविष्यवाणी की थी, ‘आने वाले वर्षों में समाचार-पत्र व पत्रिकानिकालना बड़े-बड़े सेठ-साहूकारों का काम होगा। समाचार-पत्रों की प्रसार संख्या लाखों करोड़ों में होगी। ये रंग-बिरंगी होंगे। उत्कृष्ट साज-सज्जाओं से सुसज्जित होंगे। परन्तु इन सबके बावजूद भी समाचार-पत्र प्राणहीन होंगे।’ पराड़कर जी की यह भविष्यवाणी आज अधिकांशत: सच साबित होने लगी है।

दूसरी ओर समाचार-पत्र को ऐसी उत्तरपुस्तिका की संज्ञा दी गयी है, जिसके लाखों परीक्षक होते है। पाठकों में पढ़ने की आदतों का इस कदर घटना न केवल चिन्ता का विषय है, बल्कि कुछ न कुछ असर समाज पर भी दिख सकता है। यूँ तो अखबार के संपादकीय पृष्ठ में आज भी विज्ञापन, चित्र, प्रचार, एडवोटोरियल आदि नगण्य हैं और वैचारिक सामग्री को पवित्रता के साथ परोसने की पंरपरा आज भी लगभग विद्यमान है। फिर भी संपादकीय पृष्ठ तक पहुँचते-पहुँचते अधिकांश पाठक अपनी धैर्य, और पठनीयता रूपी दम तोड़ने लगे हैं और उनकी अखबार के प्रति संलग्नता व गंभीरता समाप्त होने लगी है। इसे ‘डिजर्ट इन रीडिंग डिजर्टइन इन थिकिंग’ की संज्ञा भी दी जाती है।

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