class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

जजों के काम का ऑडिट होना चाहिए

अपनी बेबाक राय और कालजयी न्यायिक व्यवस्थाएं देने वाले जस्टिस वी आर कृष्णा अय्यर भारतीय न्यायिक इतिहास की जीवित किवदंती हैं। 30 वर्ष पूर्व सुप्रीम कोर्ट से रिटायर हुए जस्टिस कृष्णा अय्यर अब 95 वर्ष के हैं लेकिन उनके तर्कों और विचारों में अभी तक वही धार और दृष्टि है जिसके लिए वह मशहूर हैं। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में रहते हुए अनेक ऐसे फैसले दिए जो अब तक न्याय पालिका का दिशा निर्देशन करते हैं। उनके अनेक दोस्त और समकालीन उन्हें आपातकाल का ‘पिता’ भी कहते हैं। उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के खिलाफ एक फैसले में स्टे दिया था। इस स्टे के बाद ही इंदिरा गांधी ने आपातकाल की घोषणा कर दी थी। इस फैसले की एक और खासियत यह थी कि इस मामले को जस्टिस अय्यर ने बिना किसी ब्रेक के पूरे दिन सुना और इसके अगले दिन ही उन्होंने इसका फैसला दे दिया। श्रमिक हितों के संरक्षक जस्टिस अय्यर को सुप्रीम कोर्ट भी बड़ी मुश्किल से लाया जा सका। देश के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश उनके घोर विरोधी थे। उनका मानना था कि यदि जस्टिस अय्यर को प्रोन्नत किया गया तो सुप्रीम कोर्ट लेफ्टिस्ट हो जाएगा। उनके रिटायर होने के बाद ही जस्टिस अय्यर सुप्रीम कोर्ट आ सके। लेकिन यह धारणा गलत निकली, बाद में उनके यही विरोधी उनके प्रशंसक बन गए। जस्टिस अय्यर न्यायपालिका में नियुक्ति की वर्तमान प्रणाली से बेहद खिन्न हैं। उनसे रूबरू हुए हमारे विशेष संवाददाता श्याम सुमन।

उच्च अदालतों में जजों को नियुक्त करने वाले सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों के चयन मंडल (कोलजियम) इतने विवादों में क्यों है?
कोलेजियम सिस्टम ने अच्छा करने के बजाए न्याय पालिका का नुकसान ज्यादा किया है। इसके सदस्यों को जजों के चयन की कोई ट्रेंनिंग नहीं होती न ही इस प्रणाली में कोई दिशानिर्देश हैं। कोलेजियम को यह शक्ति भी प्राप्त नहीं है वह किसी उम्मीदवार जज की जांच करवा सके। कोई भी जज दो तीन साल सुप्रीम कोर्ट में रह कर मंडल का सदस्य बन जाता है यानी सर्वोच्च पांच में आ जाता है। फिर वह अपने नियर एंड डियर को  जज नियुक्त करने लगता है। इसका आपको पता नहीं लगता क्योंकि पूरी प्रक्रिया गोपनीय रहती है। भारत के अलावा विश्व में ऐसा कहीं भी नहीं            होता कि जहां जज का चयन जज करते हों। यह प्रणाली ‘रिडल रेप्ड इन मिस्ट्री’ (रहस्य में लिपटी पहेली) है।

इस प्रणाली के स्थान पर आपके अनुसार क्या होना चाहिए?
मैं कहूंगा कि जजों की नियुक्ति के लिए उच्च स्तरीय नियुक्ति आयोग होना चाहिए जिसे इस बात की विशेषज्ञता हासिल हो और यह पूरी तरह पारदर्शी हो। हम गोपनीयता की न्यायिक प्रक्रिया को स्वीकार नहीं कर सकते।

जजों की कार्यप्रणाली पर आप क्या कहेंगे?
प्रजातंत्र में जैसे सभी संस्थानों के काम का आडिट होता है वैसे ही जजों के काम का भी आडिट होना चाहिए। इसके लिए मैं सुझाव दूंगा कि एक ज्यूडीशिल परफार्मेंस कमीशन बनाया जाए जो जजों के काम की जांच करे और उन्हें जवाबदेह बनाए। जज स्वयं को जनता के प्रति जवाबदेही से बचा नहीं सकते।

जजों को कैसे जवाबदेह बनाया जा सकता है?
देखिए मुझे उस दिन झटका लगा जब देश के मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि वह जनसेवक नहीं हैं। क्या प्रजातंत्र में ऐसा कोई संस्थान है जो यह कह सके कि वह जनता के प्रति जवाबदेह नहीं है। यह अराजकता है। हम न्यायपालिका को फंक्शनल एनार्की (कार्यरत अराजकता) नहीं बनने दे सकते।

न्याय में देरी से लोगों का विश्वास न्यायपालिका से उठ रहा है?
इसके लिए आंशिक रूप से न्यायपालिका भी जिम्मेदार है। यह देरी जजमेंट न लिखने के कारण होती है। आप केसों के अंबार की ही बात क्यों करते हैं। फैसलों का भी एरियर है। इसके लिए एक प्यूनिटिव कमीशन (दंड आयोग) बनाना चाहिए जो यह देखे के किस जज ने फैसले लिखने में देर की है। अमेरिका में एक जज को फैसले में देरी के कारण हटा दिया गया था। लेकिन हमारे यहां फैसले वर्षों सुरक्षित रहते हैं। जज फैसला लिखते ही नहीं और रिटायर हो जाते हैं। और उस केस की फिर से सुनवाई होती है। मैं यह बात यूं ही नहीं कह रहा हूं, मैंने इंदिरा गांधी के केस में एक दिन में फैसला दिया था।
 
न्याय पालिका में आप और क्या कमी देखते हैं?
इसमें परिवारवाद और जातिवाद आ गया है। लोग अपने बेटे बेटियों को जज नियुक्त करने लगे हैं। एक जाति विशेष के लिए अपनी जाति के लोगों को जज बनाने लगे हैं। कोलेजियम इस तरह की नियुक्तियों के लिए किए जाने वाले मेनिपुलेशन की सुविधा मुहैया कराता है। इसलिए इस सिस्टम को बदलना चाहिए।

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:जजों के काम का ऑडिट होना चाहिए