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कोपनहेगन सम्मेलन से वापस लौटे मनमोहन

कोपनहेगन सम्मेलन से वापस लौटे मनमोहन

अमेरिकी मध्यस्थता में भारत तथा अन्य उभरते देशों के बीच कानूनी रूप से बाध्यकारी उत्सर्जन कटौती पर विकसित देशों के साथ कोई ठोस परिणाम नहीं सामने आने के बाद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जलवायु परिवर्तन संयुक्त राष्ट्र शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेने के बाद शनिवार को स्वदेश वापस लौट आए।

चीन, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका से वार्ता करने के लिए प्रधानमंत्री ने कोपनहेगन में पांच और घंटे रुकने का फैसला किया। इसके साथ ही सम्मेलन में उन्होंने यह साफ कर दिया कि भविष्य में होने वाली बातचीत क्योटो प्रोटोकॉल और बाली घोषणा के मुताबिक एक समान जिम्मेदारी की अवधारणा पर आधारित होनी चाहिए।

अमेरिका और बेसिक देशों (ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका, भारत और चीन) के बीच हुआ समझौता विकसित देशों के पक्ष में साफ तौर पर मालूम देता है। वर्ष 1997 में जारी हुए क्योटो प्रोटोकॉल के मुताबिक ये देश उत्सर्जन कटौती के लिए कानूनी रूप से बाध्य हैं।

क्योटो प्रोटोकॉल की अवधि वर्ष 2012 में समाप्त होने जा रही है। इसमें शामिल संयुक्त राष्ट्र के 194 देश प्रोटोकॉल के समय विस्तार पर कोई सहमति बनाने में अब तक नाकाम रहे हैं।

भारत की तरफ से वार्ता में शामिल हुए पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश और प्रधानमंत्री के विशेष दूत श्याम सरण ने स्वीकार किया कि समझौता तब तक पूरा नहीं होगा जब तक कि सभी पक्ष इसे अपनी मंजूरी नहीं देंगे। रमेश ने समझौते को फायदेमंद बताया।

हालांकि तुवालु, बोलिविया, कोस्टा रिका, वेनेजुएला और क्यूबा के प्रतिनिधियों ने अमेरिका और बेसिक देशों के बीच हुए समझौते की आलोचना करते हुए कहा कि मसौद को अंतिम रूप देने की प्रक्रिया से उन्हें बाहर कर और बहुमत पर इस दस्तावेज को थोपकर उनका अपमान किया गया है।

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