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कोपेनहेगन सम्मेलन बिना किसी आम सहमति के समाप्त

कोपेनहेगन सम्मेलन बिना किसी आम सहमति के समाप्त

जलवायु परिवर्तन सम्मेलन शनिवार को बिना किसी आम सहमति के खत्म हो गया। हालांकि अमेरिकी प्रयास से भारत सहित तीन अन्य उभरती अर्थव्यवस्थाओं और अमेरिका के बीच उत्सर्जन कटौती पर कानूनी रूप से एक गैर बाध्यकारी समक्षौता हुआ जिसे ज्यादातर विकासशील देशों ने आत्मघाती करार देते हुए पूरी तरह खारिज कर दिया।

सम्मेलन में कोई आम सहमति नहीं बन पाई और अमेरिकी राष्ट्रपति के प्रयासों से बेसिक देशों के साथ हुआ उनका समक्षौता भी विकासशील देशों ने नामंजूर कर दिया। ओबामा बेसिक देशों के नेताओं प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, चीनी प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ और ब्राजील तथा दक्षिण अफ्रीका के नेताओं की बैठक में अचानक पहुंच गए। गहमागहमी भरे और कई बार नाटकबाजी देखने वाले 12 दिवसीय सम्मेलन के शनिवार की सुबह खत्म होने पर डेनमार्क के प्रधानमंत्री लार्स रासुमसेन ने बिना झिझक इस बात को स्वीकारा कि कोई आम सहमति नहीं बन पाई और कोई समझौता स्वीकार नहीं किया गया।

कोपेनहेगन सम्मेलन में बराक ओबामा और आथिक रूप से उभरते चार देशों द्वारा तैयार प्रस्ताव को मानने से कई विकासशील देशों ने यह कहते हुए इंकार कर दिया कि यह जलवायु परिवर्तन के खतरों से निपटने के लिए संयुक्त राष्ट्र का मसौदा नहीं हो सकता है।

इसके पूर्व ब्राजील, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका ने धरती के तापमान को दो डिग्री से अधिक नहीं बढ़ने देने के लिए एक उत्सर्जन लक्ष्य बनाने पर अपनी सहमित दे दी।

विकासशील देशों ने कहा कि हमें ये प्रस्ताव मंजूर नहीं है क्योंकि हमें आशंका है कि समुद्र के जल स्तर बढ़ने से हमारे देश का नामोनिशान मिट जाएगा।

वेनेजुएला, बोलिविया, क्यूबा और निकारागुआ के प्रतिनिधियों ने भी इस प्रस्ताव की कडी़ आलोचना करते हुए कहा कि इससे जलवायु परिवर्तन के खतरों से नहीं निपटा जा सकता है। उन्होंने इसके पक्षपातपूर्ण होने का भी आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि संयुक्त राष्ट्र का मसौदा बनने से पहले किसी भी प्रस्ताव को 193 देशों द्वारा सर्वसम्मति से पारित होना आवश्यक है।

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