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असमय मौत पास नहीं आए

असमय मौत पास नहीं आए

भगवान शिव का मृत्युंजय रूप रत्नों की आभा के समान चमकीला और हाथ में अमृत कलशों को धारण करने वाला है। भगवान शिव के किसी भी अन्य रूप की आराधना से न सुलझने वाली मुसीबत का ही उपाय महामृत्युंजय है। अन्य उपाय रहते हुए की गई महामृत्युंजय की पूजा जप निष्फल या विपरीत प्रभाव भी पैदा कर सकते हैं। इसे शास्त्रों में दुधारी तलवार कहा गया है। अत: जब सब रास्ते बन्द हो जाएं तभी महामृत्युंजय शिव की शरण में जाना चाहिए।
मृत्युंजय शिव मृत्यु को जीतने वाले हैं। यमदूत इनके भक्त के पास असमय नहीं आते हैं और मृत्यु के अन्य रूप भी परेशान नहीं करते हैं। रोग, शोक, मुसीबत में जब सब रास्ते बन्द दिखें या रोग की जटिलता के कारण मुसीबतजदा आदमी और उसके परिजन खुद ही मृत्यु की कामना कर रहे हों तब भी मृत्युंजय की शरण में जाना चाहिए।

श्री मृत्युंजय सदा सहाय
सारे मुख्य मृत्युंजय मन्त्रों में शामिल होने के कारण आजकल इस मूल त्र्यम्बक मन्त्र को ही असली महामृत्युंजय समझने की भूल की जा रही है। इसे आप अपनी नित्य पूजा में शामिल कर सकते हैं। स्वास्थ्य रक्षा, श्रीवृद्घि और आयु रक्षा होगी।

ऊँ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥
कम जटिल जब रोग हो  मृत्युंजय मन्त्र के मुख्य तीन रूपों में पहला मृत्युंजय नाम से जाना जाता है। यह साधारण रोग, शोक में खास तौर से कारगर है।

ऊँ भू:ऊँ भुव:ऊँ स्व: ऊँ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥ ऊँ स्व:ऊँ भुवऊँ भू:ऊँ।।
सांघातिक हालात में मृतसंजीवनी

दूसरा मृतसंजीवनी मन्त्र अपने नाम के अनुरूप ही शरीर को लगातार कमजोर करने वाले रोगों की शान्ति और जटिल रोग की पहचान कराने में मददगार साबित होता है। यह दुधारी तलवार की तरह काम करता है। रोगी या अतिवृद्घ जन को असहनीय कष्ट हो और शरीर छूटने में अनावश्यक देरी हो रही हो तो भी यह मन्त्र सहायक होता है। यही बहुप्रचलित रूप है।

ऊँ हौं जूं स: ऊँ भूभरुव: स्व: ऊँ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् ऊँ स्व: भुव भू:ऊँ स: जूं हौंऊँ।।

असली महामृत्युंजय मन्त्र यह है-
ऊँ हौं ऊँ जूं ऊँ स: ऊँ भू:ऊँ भुव:ऊँ स्व:ऊँ
त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥
ऊँ स्व:ऊँ भुवऊँ भू:ऊँ स: ऊँ जूं ऊँ हौं ऊँ।।

मृतसंजीवनी या महामृत्युंजय मन्त्र का विधान रोग या मुसीबत की गम्भीरता के अनुसार एक करोड़ से एक लाख तक हो सकता है। 

उक्त चारों में से किसी मन्त्र को रोजाना 108 बार जपने या/और 10 आहुति देने से क्या क्या लाभ हैं, यह सब तालिका में देखें। बताए गई चीज की आहुति दी जाएगी।

मृत्युंजय के अन्य सरल रूप जब शरीर में विषैले विजातीय पदार्थ जमा होकर रोग पैदा करें तो इससे अभिमन्त्रित जल का सेवन करें-
ऊँ जूं स: पालय पालय।।

अनिष्ट की आशंका (अनिष्ट आने पर नहीं) होने पर इस मन्त्र को रोज जपें-
ऊँ जूं स: स: जूं ऊँ।।

शरीर में किसी रोग, बुढ़ापा या रेडियेशन के कारण रक्त प्रवाह धीमा हो या वात रोग हो तो यह मन्त्र लाभकारी है-
ऊँ हौं जूं स:।।

जिगर की खराबी से उत्पन्न परेशानी में यह मन्त्र नियमित जपें-
ऊँ वं जूं स:।।अथवा रोजाना इस मन्त्र का अनगिनत जप किया करें-

ऊँ मृत्युंजयाय रुद्राय नीलकण्ठाय शम्भवे।
अमृतेशाय शर्वाय महादेवाय ते नम:ऊँ।।

कब आराधना करें?
मृत्युंजय शिव सब प्रकार की मृत्यु सामने होने पर सहायक हैं। विचारशील लोगों ने मृत्यु के आठ रूप माने हैं-
1.  शर्मिन्दगी
2.  बड़ा रोग
3. बड़ा शोक
4. बड़ा भय
5. घोर पीड़ा
6. अपमान
7. बदनामी, निन्दा
8. देहान्त।
इनमें से किसी भी प्रकार का कष्ट हो तो नि:संकोच मृत्युंजय शिव की शरण में जाइए, शुभ ही शुभ होगा। जब तक घातक और जटिल स्थिति न हो तब तक महामृत्युंजय का सहारा न लें, तो ही अच्छा है।

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